Old Testament
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होशे 4:1 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
हे इस्राएलियों, यहोवा का वचन सुनो; इस देश के निवासियों के साथ यहोवा का मुकद्दमा है। इस देश में न तो कुछ सच्चाई है, न कुछ करुणा और न कुछ परमेश्वर का ज्ञान ही है। (प्रका. 6:10)
होशे 4:1 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 4:1 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यिर्मयाह 4:22 (HINIRV) »
“क्योंकि मेरी प्रजा मूर्ख है, वे मुझे नहीं जानते; वे ऐसे मूर्ख बच्चें हैं जिनमें कुछ भी समझ नहीं। बुराई करने को तो वे बुद्धिमान हैं, परन्तु भलाई करना वे नहीं जानते।”

मीका 6:2 (HINIRV) »
हे पहाड़ों, और हे पृथ्वी की अटल नींव, यहोवा का वाद विवाद सुनो, क्योंकि यहोवा का अपनी प्रजा के साथ मुकद्दमा है, और वह इस्राएल से वाद-विवाद करता है।

यशायाह 3:13 (HINIRV) »
यहोवा देश-देश के लोगों से मुकद्दमा लड़ने और उनका न्याय करने के लिये खड़ा है*।
होशे 4:1 का संदर्भ और खुलासा
होशे के समय इस्राएली भर्त्सना के कठोर दृश्यों के बीच एक न्यायपूर्ण मुकद्दमा प्रस्तुत किया गया है कि ईश्वर के साथ उनका वैचारिक और नैतिक दोष क्या है। इस देश के निवासियों में न सच्चाई है, न करुणा, न परमेश्वर का ज्ञान ही है—ये पंक्तियाँ एक सार्वजनिक आह्वान हैं कि परमेश्वर अपने लोगों के भीतर की सच्चाई, दयालुता और कर्तव्य को वापस खोजें। प्राकार्थिक रूप से यह एक दिव्य शिकायत है कि देश के नेता और नागरिक पवित्र नियमों के बजाय स्वार्थ और अन्याय में लिप्त हैं, और इसीलिए प्रभु का मुकद्दमा उठ खड़ा होता है।
केंद्रीय अर्थ
वरदान-हार और अपराध के बीच निरपेक्ष असंतुलन दिख रहा है: परमेश्वर का प्रश्न यह है कि क्या उनके निवासियों के जीवन में सत्य, करुणा और ज्ञान के वह प्रमाण मौजूद हैं जो एक जीवन-उद्धारय प्रेम के साथ जुड़े हों। यह एक तरह का समाज-आत्म-चैत्य है जिसमें नैतिक संरचना कमजोर पड़ गई है, और इस असंतुलन के कारण न्याय का विराम होता है।
मुख्य विषय
अनुशासनात्मक प्रबोधन—प्रेरक दृष्टिकोण
उद्धार के मार्ग में सत्य, करुणा और ज्ञान का पुनःस्थापन परमेश्वर की योजना का केंद्र है। जब समाज में ये तीनों घटक टूट जाते हैं, तब दैवी क्षोभ और दंड की मांग उठती है ताकि मूल्यों की पुनर्स्थापना हो सके। कथन इस संदेश के साथ जीवन-यथार्थ का आह्वान है—आपसी न्याय, ईमानदारी और परमेश्वर की शिक्षा को जीवन का नियम बनाइए।
संलग्न विचार—पाँच आयाम
होशे की बातों से प्रेरित तीन प्रमुख आयाम जो आज भी लागू होते हैं:
संवदाहरण, पार्श्व-आगे की राह
पवित्र लेखों में अन्य जगहें इस त्रयी को पुनः उजागर करती हैं: शरीर के भीतर सत्य की स्थिति के बारे में मत्ती 7:21-23, मिलाप के लिए करुणा का महत्व जिसमें याकूब 2:14-17 भी एक भूमिका निभाते हैं, और शिक्षा के प्रकाश में 2 तिमोथ 3:16-17। ये संकेत बताते हैं कि जीवन-धरातल पर सत्य, करुणा और ज्ञान के संतुलन से ही सच्चा धर्म उभरता है।
व्यावहारिक विचार
आज के समय में यह होशे का संदेश एक स्मरण है कि अपने व्यवहार की गहराई में सत्य और करुणा को व्यक्त करें, और परमेश्वर के शब्द को अपने निर्णयों की कसौटी बनाएं। परिवार, समुदाय और समाज के स्तर पर छोटे-छोटे कदम—झूठ से बचना, एक-दूसरे की मदद करना, और धार्मिक ज्ञान को जीवन में सही रूप से लागू करना—देव-आनंद का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
संक्षिप्त निष्कर्ष
होशे 4:1 समाज की उसी कमी को उजागर करता है जो सत्य, करुणा और ज्ञान के अभाव में पनपती है। परमेश्वर का मुकद्दमा इस बात पर है कि जीवन के हर क्षेत्र में these तीनों ईमानदारी के साथ फिर से स्थापित हों।
पवित्र लेखक: मध्यस्थता से एकीकृत अंतर्दृष्टियाँ — Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से मिली एकत्रित मौलिक व्याख्या के अनुरूप सन्निवेश।
संक्षिप्त cross-refs: - संदर्भ 1: एक समान नैतिक-आकलन पर विचार देता है कि सत्य और न्याय कैसे समाज को बनाए रखते हैं। - संदर्भ 2: दया और करुणा की मांग, समुदाय में एकजुटता के लिए आवश्यक। - संदर्भ 3: ज्ञान का अर्थ परमेश्वर के वचन को जानना और सही ढंग से लागू करना।
फुटनोट: इस commentary में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के शब्दों से संकलित विचारों का सार प्रकट किया गया है; उनके पूर्ण उद्धरण केवल आवश्यक स्थलों पर सीमित हैं।