Old Testament
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होशे 4:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
एप्रैम मूरतों का संगी हो गया है; इसलिए उसको रहने दे।
होशे 4:17 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 4:17 समानांतर पद और संबंधित वचन
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भजन संहिता 81:12 (HINIRV) »
इसलिए मैंने उसको उसके मन के हठ पर छोड़ दिया, कि वह अपनी ही युक्तियों के अनुसार चले। (प्रेरि. 14:16,)

होशे 13:2 (HINIRV) »
और अब वे लोग पाप पर पाप बढ़ाते जाते हैं, और अपनी बुद्धि से चाँदी ढालकर ऐसी मूरतें बनाते हैं जो कारीगरों ही से बनीं। उन्हीं के विषय लोग कहते हैं, जो नरमेध करें, वे बछड़ों को चूमें!

होशे 4:4 (HINIRV) »
देखो, कोई वाद-विवाद न करे, न कोई उलाहना दे, क्योंकि तेरे लोग तो याजकों से वाद-विवाद करनेवालों के समान हैं।
होशे 4:17 का संक्षिप्त प्रवचन
इस पद में होशे ने इस्राएल के राज्य-संयोग के टूटने के कारणों में एक कठोर लेकिन आवश्यक चिनौती दी है। एप्रेम (जिन्हें हम आज का उत्तरी राज्यों का कहलाते हैं) को “मूरतों का संगी” कहा गया है, अर्थात् वे परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध में वैचारिक, सामाजिक और धार्मिक विविधताओं में फँसकर मूर्तिपूजारिता की ओर लौट गए हैं। यहाँ उद्धारणीय बात यह है कि परमेश्वर अपने लोक के पाप के परिणामस्वरूप उन्हें ‘‘रहने दें’’ कहते हैं—यानी उनका क्रमिक पतन आक्रामक नहीं, बल्कि उन्हें अपने कर्मों के अनुसार उनके दांव-पेंच में छोड़ देना। यह verse एक चेतावनी है कि विश्वास-जीवन में एकाग्रता और निष्ठा चाहता है; जब साथी देशों के साथ मिलकर उन्होंने मूर्तियों से प्रेम किया, तो उनका आस्थागत क्षय स्पष्ट हो गया।
आरम्भिक अर्थ और 중앙 विचार
सीधा अर्थ यह है कि इस्राएल की आत्मीयता अब मूर्तिपूजा के साथ है, और यह उसे परमेश्वर के साथ दूरी तक ले जाएगी। “रहने दे” का संकेत एक आध्यात्मिक निष्क्रियता या दण्ड है, जहाँ प्रभु नीचे से ऊपर नहीं बढ़े, बल्कि लोग परिणामस्वरूप अपनी इच्छा के अनुसार चलते रहते हैं। होशे इस बात को दर्शाते हैं कि धर्मस्वरूप समाजिक और मानसिक लक्ष्य गलत हो जाएं, तो परमेश्वर अपनी स्थापना-चक्र को उनपर छोड़ सकते हैं ताकि वे अपने मार्ग का परिणाम भुगतें।
मुख्य विषय
Related passages
1) होशे 4–6 परिशुद्ध निष्कर्ष: मूर्तिपूजा की प्रवृत्ति और ईश्वर के साथ भेदभाव का खतरा।
2) होशे 2:13–14: परमेश्वर के प्रति चाटुकारिता और आत्मिक बंधन में कमी के दुष्परिणाम।
3) यीशु के उदाहरणों में आत्म-निष्ठा बनाम तात्कालिक सुख: सेवा-आस्था को प्राथमिकता देना।
नैतिक-व्यावहारिक ध्यान
आज के पाठक के लिए यह चेतावनी है कि व्यक्तिगत विश्वास में एकाग्रता और परमेश्वर के साथ अडिग रिश्ता अनिवार्य है। सामाजिक दबाव, मनोवैज्ञानिक आकर्षण या वैचारिक विविधताओं के बीच भी हम उस एक ईश्वर के प्रति निष्ठा बनाये रखें, जो हमें बुलाता है। मूर्तिपूजा की “संगति” से दूर रहें—सच्चा जीवन ईश्वर के साथ निर्भरता और पल-पल की प्रार्थना में है।
छोटे-से-विश्वास के लिए एक क्रियात्मक मार्गदर्शन
क्लोजिंग सार
यह verse हमें याद दिलाती है कि सामाजिक-धार्मिक पहचान के साथ-साथ आत्मा का एकत्व कैसे बना रहे—और यदि हम मूर्तिपूजा जैसी चीजों में फंस जाएँ, तो परमेश्वर हमारी राहों को छोड़ देते हैं ताकि हम अपने पथ पर लौटें या टूटते रहें। सत्य यही है कि निष्ठा से जीना परमेश्वर के साथ सबसे भरोसेमंद मार्ग है; अन्यथा, परिणामस्वरूप दूरी और दंड स्पष्ट होते हैं।
Cross-references और उनका छोटा स्पष्टीकरण
1) होशे 2:13 — आत्मिक बंधन की कमी के दुष्परिणाम, जहाँ लोग बाहरी प्रदर्शन में चालाक हो जाते हैं लेकिन अंतरात्मा में खालीपन रहता है।
2) होशे 6:6 — धरोहर है प्रेम और जन-सम्पर्क; धार्मिक अनुष्ठानों से बढ़कर नैतिक निष्ठा को महत्व देना।
3) भजन 73:25–26 — परमेश्वर के साथ सम्बन्ध सर्वोच्च है; सब कुछ खो जाने पर भी वह ही हमारा भाग्य है।
नोट: इस पाठ के लिए Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सामान्य-पत्र-तत्वों से उद्धरण आवश्यक हो तो वे नीचे दिए गए संकेतों के अनुसार हैं: “यह मत भूलिए कि मूर्तिपूजा से दूरी रखना परमेश्वर द्वारा सुझाया गया एक स्थायीत्व है” (यथार्थ पंक्ति में शीर्षक के अनुसार संक्षेपित भावार्थ)। इन विचारों को समेकित करते हुए हमने एक सरल, सजीव हिंदी पाठ प्रस्तुत किया है।