Old Testament
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होशे 4:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
इस कारण यह देश विलाप करेगा, और मैदान के जीव-जन्तुओं, और आकाश के पक्षियों समेत उसके सब निवासी कुम्हला जाएँगे; और समुद्र की मछलियाँ भी नाश हो जाएँगी।
होशे 4:3 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 4:3 समानांतर पद और संबंधित वचन
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सपन्याह 1:3 (HINIRV) »
“मैं मनुष्य और पशु दोनों का अन्त कर दूँगा; मैं आकाश के पक्षियों और समुद्र की मछलियों का, और दुष्टों समेत उनकी रखी हुई ठोकरों के कारण* का भी अन्त कर दूँगा; मैं मनुष्य जाति को भी धरती पर से नाश कर डालूँगा,” यहोवा की यही वाणी है। (मत्ती 13:41)

यशायाह 24:4 (HINIRV) »
पृथ्वी विलाप करेगी और मुर्झाएगी, जगत कुम्हलाएगा और मुर्झा जाएगा; पृथ्वी के महान लोग भी कुम्हला जाएँगे।

नहूम 1:4 (HINIRV) »
उसके घुड़कने से महानद सूख जाते हैं, वह सब नदियों को सुखा देता है; बाशान और कर्मेल कुम्हलाते और लबानोन की हरियाली जाती रहती है।
मुख्य बोध: संसार के विनाश में प्रकृति का विलाप
होशे 4:3 के इस वाक्य में परमेश्वर‑नातेदारी के कारण प्राणी-पृथ्वी का एकत्रित कष्ट दिखता है। देश विलाप करेगा क्योंकि परमेश्वर के न्याय के आह्वान ने उसकी सभी संरचनाओं को हिला दिया है—भूमि की चिड़िया से समुद्री मछली तक, सब एक साथ कुम्हलाने लगेंगी। यह वचन मानव आचरण के परिणामस्वरूप प्रकृति पर एक सनसनीखेज चोट का चित्र है; यह प्रकृति की निर्भरता को बताता है कि किस प्रकार पाप ने ईश्वर की व्यवस्था में चोट पहुँचाई है और प्रकृति भी उसके कारण प्रभावित होती है।
कथात्मक संदर्भ ( literary context )
होशे की वर्णनशैली में परमेश्वर का न्याय सुनसान और डरावने स्वर के साथ आता है। अंश 4:1‑3 में पाप की विविधता और विवाह-परंपरा के विचलन, असत्य और भ्रष्टाचार रेखांकित हैं; यह सब एक साथ उस दिन के लिए चेतावनी देता है जब प्रभु अपने दंड को देश पर उभारेंगे। इस विशेषVerse 3 में प्राणी मात्र के विलाप की धारणा एक व्यापक प्रभाव को दिखाती है—आकाश cheering से लेकर समुद्र की गहराई तक, हर प्रकार का जीव इस अनहोनी का अनुभव करेगा।
पार्लियात्मक और थियोलॉजिकल महत्व
यह आयत यह बताती है कि पाप के फल न केवल मानव के भीतर बल्कि सभी रचनों के बीच एक रैंडम असंतुलन पैदा करते हैं। परमेश्वर की व्यवस्था और संरक्षण के बिना, हर एक अस्तित्व एक असुरक्षित स्थिति में रहता है। परन्तु इस दंड के पीछे एक गहरी प्रेरणा है: चेतावनी देना और लोगों को लौटने का मौका देना। यह दृश्य "सृष्टि की त्रासदी" के रूप में उद्धोषित होता है, ताकि लोग उद्धारकर्ता की ओर पलटें।
अतीत के टिप्पणीकारों का सार
— Matthew Henry: प्रकट करता है कि प्रकृति अपने उद्धार के लिए नहीं, बल्कि न्याय के संकेत के रूप में विलाप कर रही है; यह संकेत है कि पाप की सामर्थ्य ने सभी प्रतिष्ठानों को टूटा है। “This is the effect of sin upon outward things.”
— Albert Barnes: इस वाक्य के अनुसार, देव-न्याय के समय प्राकृतिक संसार में व्यापक क्षरण दिखाई देता है; यह नहीं कि पशु-पक्षी तब तक शांत न रहें, बल्कि यह दर्शाता है कि परमेश्वर का नियंत्रण सब पर समान रूप से है।
— Adam Clarke: इस पाठ में प्रकृति का समस्त तंत्र एक साथ जवाब देता है; वह दर्शाता है कि परमेश्वर की सत्ता से दुनिया सुरक्षित है, परन्तु पाप के कारण वह टूट जाती है।
क्रॉस‑रेफरेंसेस (संयोगी संदर्भ)
1) रोम 8:22: सृष्टि की कोलाहल-स्थिति और उद्धार की प्रतीक्षा—सृष्टि भी परिवर्तन की उम्मीद में छटपटा रही है। यह अंश दिखाता है कि पश्चात्ताप और उद्धार से पहले प्रकृति अपने अनुराग और दुख को साझा करती है।
2) जिन 3:15: तब भी इतिहास में पाप के कारण दर्द और शोक का आना—परन्तु ईश्वर का आदर्श न्याय भी स्पष्ट रहता है।
3) मत्ती 24:29–30: न्याय के समय आकाश-पाताल का कम्पन, और मानवजाति की दृष्टि से उद्धार का जागरण—यहाँ भी विलाप का संकेत मिलता है कि परमेश्वर के आने से पहले विनाशकारी संकेत मिलते हैं।
विचार-विमर्श के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
होशे 4:3 हमें स्मरण दिलाता है कि पाप के कारण सृष्टि भी सभय संकट की स्थिति में होती है—परंतु परमेश्वर का उद्देश्य न्याय के साथ सुधार और उद्धार की राह दिखाना है। इस दृष्टि से, आत्म-पराजय के बजाय परमेश्वर की ओर पलटना ही जीवन का सत्य है।