Old Testament
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होशे 4:7 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
जैसे वे बढ़ते गए, वैसे ही वे मेरे विरुद्ध पाप करते गए; मैं उनके वैभव के बदले उनका अनादर करूँगा।
होशे 4:7 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 4:7 समानांतर पद और संबंधित वचन
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होशे 13:6 (HINIRV) »
परन्तु जब इस्राएली चराए जाते थे और वे तृप्त हो गए, तब तृप्त होने पर उनका मन घमण्ड से भर गया; इस कारण वे मुझ को भूल गए।

1 शमूएल 2:30 (HINIRV) »
इसलिए इस्राएल के परमेश्वर यहोवा की यह वाणी है, कि मैंने कहा तो था, कि तेरा घराना और तेरे मूलपुरुष का घराना मेरे सामने सदैव चला करेगा; परन्तु अब यहोवा की वाणी यह है, कि यह बात मुझसे दूर हो; क्योंकि जो मेरा आदर करें मैं उनका आदर करूँगा, और जो मुझे तुच्छ जानें वे छोटे समझे जाएँगे।

होशे 4:10 (HINIRV) »
वे खाएँगे तो सही, परन्तु तृप्त न होंगे, और वेश्यागमन तो करेंगे, परन्तु न बढ़ेंगे; क्योंकि उन्होंने यहोवा की ओर मन लगाना छोड़ दिया है।
होशे 4:7 पर टिप्पणी – अध्याय का संदर्भ और पाठ
होशे के यह सूत्री कथन स्पष्ट करता है कि जब लोग पाप में बढ़ते हैं, तब परमेश्वर की अवहेलना के परिणाम भी उसी अनुपात में होते हैं, और वैभव-समृद्धि के साथ उनका सम्मान घटता है। यह अध्याय इस बात पर केन्द्रित है कि पाप के बढ़ते क्रम में ईश्वर की व्यवस्था पर लोगों की निष्ठा कमजोर पड़ती है, और परिणामतः परमेश्वर उनकी प्रशंसा के बजाय उनका अनादर कर देता है।
पद का पाठ और संदर्भ
जैसे वे बढ़ते गए, वैसे ही वे मेरे विरुद्ध पाप करते गए; मैं उनके वैभव के बदले उनका अनादर करूँगा।
यह एक नीतिगत चेतावनी है कि न केवल व्यक्तिगत पाप, बल्कि सांझीय-समूह के पाप भी समाज के नायकों और समृद्धि के स्रोतों को प्रभावित करते हैं। होशे यह दिखाते हैं कि ईश्वर के निकटता से दूर होना किसी भी तरह की उच्च स्थिति, धन या पुत्र-सम्पत्ति को स्थायी नहीं कर पाता; उसका मापन पाप के प्रकटन और उसके परिणामों से जुड़ा है।
चैप्टर के भीतर प्रमुख विचार
होशे के प्रेषण में यह विचार बार-बार उठता है किIsrael के लोग अहंकार, पाप और असंवेदनशीलता के कारण ईश्वर के साथ अपने संबन्ध को खो रहे हैं। यह पद उन प्रवृत्तियों का खुलासा करता है जिनसे समाज सुसंकेत नहीं कर पाता और अंततः “अना-निन्दा” के रूप में उनके वैभव की क्षय होती है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
ईश्वर की भलाई और दया के साथ साथ न्याय की आवश्यकता एक साथ मौजूद है। जब लोग अपने पापों पर पाठ नहीं लेते और भागवत-यश के लिए उत्तरदायित्व नहीं निभाते, तब परिणामस्वरूप दया घटती है और ईश्वर का अनुग्रह घट सकता है। यह संदेश सतर्कता और आत्म-परिशोधन का है: अपने जीवनों को ईश्वर के मार्ग पर पुनः व्यवस्थित करें, ताकि वैभव के साथ साथ आस्था और नम्रता बनी रहे।
अनुकृतियाँ—अन्य ग्रंथों से सम्बद्ध पंक्तियाँ
- उक्ति के समान प्रवृत्ति किन्हीं अन्य प्रेषणों में भी दिखती है कि पाप बढ़ने पर ईश्वर के दंड और सुधार आते हैं (उदा. यह्र्देश के न्याय और दया के संतुलन को समझना)।
- कुछ अन्य प्रमुख वचनों में यह दर्शाया गया है कि भलाई के रास्ते से दूर होने पर सामाजिक-आर्थिक उन्नति भी खतरे में पड़ जाती है और ईश्वर की दृष्टि से असंतुलन बढ़ता है (उद्धृत विचार संदर्भ के रूप में देखें: अन्य prophets के संदेश)।
विचारशील अनुप्रयोग
क्रॉस-रेफरन्स और उनके संक्षिप्त संबंध
1) हबक्कुक 1:13—ईश्वर की दृष्टि से पाप की गहराई और उसकी सच्चाई के प्रति संवेदना।
2) यिर्मयाह 6:15—सम्मान-घटते जाने के साथ पाप के दुष्परिणाम।
3) रोम 1:21–24—ईश्वर के विरुद्ध मन की खराबी और परिणामस्वरूप जीवन का विक्षेप।
इन संदर्भों में दिखता है कि जब हृदय ईश्वर से दूर होता है, तब सामाजिक-आर्थिक और नैतिक संरचनाएँ असंतुलित हो जाती हैं, और ईश्वर की महिमा के अनुरूप आचरण का अभाव बढ़ता है।
संक्षेप
होशे 4:7 यह सन्देश देता है कि पाप बढ़ते ही समाज की आस्थागत संरचना कमजोर होती है और वैभव के बदले ईश्वर अनुचित अवमानना का हकदार बन जाते हैं। ईश्वर न्याय के साथ प्रेम भी रखते हैं; सतर्क होकर पाप से दूरी बनानी चाहिए ताकि आंतरिक वैभव और बाहरी सफलता दोनों टिके रहें। यह संदेश आज भी प्रासंगिक है कि हम अपने जीवन की दिशा ईश्वर के कड़े नियमों और दया-युक्त प्रेम के संतुलन में रखें।
उद्धरण-योग्य विशिष्ट पंक्तियाँ: यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों में संकलित सामान्य विवेचनाओं के अनुसार समाहित हैं।