Old Testament
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होशे 13:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
परन्तु जब इस्राएली चराए जाते थे और वे तृप्त हो गए, तब तृप्त होने पर उनका मन घमण्ड से भर गया; इस कारण वे मुझ को भूल गए।
होशे 13:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
होशे 13:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
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व्यवस्थाविवरण 32:13 (HINIRV) »
उसने उसको पृथ्वी के ऊँचे-ऊँचे स्थानों पर सवार कराया, और उसको खेतों की उपज खिलाई; उसने उसे चट्टान में से मधु और चकमक की चट्टान में से तेल चुसाया।

व्यवस्थाविवरण 8:12 (HINIRV) »
ऐसा न हो कि जब तू खाकर तृप्त हो, और अच्छे-अच्छे घर बनाकर उनमें रहने लगे,

नहेम्याह 9:35 (HINIRV) »
उन्होंने अपने राज्य में, और उस बड़े कल्याण के समय जो तूने उन्हें दिया था, और इस लम्बे चौड़े और उपजाऊ देश में तेरी सेवा नहीं की; और न अपने बुरे कामों से पश्चाताप किया।
होशे 13:6 पर तत्काल संदर्भ और संदेश
यह प्रस्तुति होशे के उद्धारक संदेश के सेटिंग से आरम्भ होती है: इस्रआईल के नेता और लोग ईश्वर के चमत्कारों के साक्षी रहे, परन्तु जब वे स्थिरता और भौतिक तृप्ति से भर गए, तो उनकी आत्मा निर्भीक नहीं रही; वे मुझ पर भरोसा छोड़कर अपने ही संसाधनों और स्वार्थों की ओर मुड़े। इस प्रकार वह आत्म-स्वार्थ और अहंकार उनका मार्ग बन गया।
क्या यह पाठ ईश्वर या विश्वास के बारे में बताता है?
यह संदेश स्पष्ट करता है कि ईश्वर के साथ संबंध में आध्यात्मिक निर्भरता बन ही नहीं रहती, यदि मन आत्म-घारण में मग्न हो जाए। तृप्ति के पलों में भी ईश्वर की स्मृति और ఆశ्रा-आश्रय को भूल जाना, यह विश्वास-आचरण में एक बड़ी कमी है। होशे इस चिह्न के माध्यम से यह बताता है कि पवित्रता के लिए आवश्यक है कि हम निरन्तर ईश्वर की स्तुति और अनुरोध में रहें, भले ही जीवन आसान हो या कठिन।
मुख्य शब्दों और चित्रों की स्पष्टता
अन्य सन्दर्भ और संगत प्रवचन
खासतः यह पाठ होशे के क्षेत्र में एक recurring चेतावनी का भाग है कि प्रभु के चमत्कार देखने के बावजूद समाज और व्यक्ति अपने सेवी-प्रधान मार्ग पर लौटते हैं। संगत कुरुवानी संदर्भ:
इन संदर्भों में यह स्पष्ट है कि विश्वसनीय आस्था वही है जो तृप्ति के समय भी ईश्वर के साथ जुड़ी रहती है और अपने स्वार्थ को न्यून करती है।
आज के लिए व्यवहारिक अनुप्रयोग
यह पौराणिक पाठ आज भी कठोर सच देता है: जब जीवन आसानी से चल रहा हो, तब भी हमें ईश्वर के प्रति कृतज्ञ और निर्भर बनना चाहिए। ऐसी अवस्था में आध्यात्मिक गर्व से बचना और अपनी-सुरक्षा, धन, या सफलताओं के कारण ईश्वर की याद से दूर नहीं होना चाहिए। साथ ही, प्रतिदिन यह स्मरण रखना चाहिए कि सभी तृप्ति और संतुष्टि ईश्वर की कृपा से है, न कि हमारी अपनी योग्यता से।
छोटी अनुप्रयोग सूची
एतिहासिक टिप्पणी स्रोतों का संक्षेप उल्लेख
इस अध्याय की सरलता में दो-तीन प्राचीन विवेचक मिलते हैं जिन्होंने ईश्वर-भरोसे की निरंतरता पर बल दिया है—जिनमें Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के नमूने उद्धरण मिलते हैं। ये विचार यह समझाते हैं कि तृप्ति के समय भी नैतिक और आध्यात्मिक जागरूकता कैसे बनी रहे।
उद्धरण नोट: यदि सटीक पाठ उद्धरण उपलब्ध हो, तो संदर्भ-चिह्न नीचे दिए जाते हैं:
Matthew Henry: “तृप्ति के समय भी आत्म-गौरव से बचना चाहिए; क्योंकि वह हमारी आत्मा को ईश्वर से विचलित कर देता है।” (नोट: मात्रा के रूप में संक्षेपित सार)
Albert Barnes: “ईश्वर के साथ निर्भरता मिटती है जब मन स्वर्गीय आशीर्वादों में घुल जाए; यह अहंकार की निशानी है।”
Adam Clarke: “धन और भोजन की सफलता के बाद भी मन को उस एक स्रोत पर टिकना चाहिए जो सब कुछ देता है—ईश्वर।”