Old Testament
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होशे 13:11 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
मैंने क्रोध में आकर तेरे लिये राजा बनाये, और फिर जलजलाहट में आकर उनको हटा भी दिया।
होशे 13:11 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 13:11 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 शमूएल 10:19 (HINIRV) »
परन्तु तुम ने आज अपने परमेश्वर को जो सब विपत्तियों और कष्टों से तुम्हारा छुड़ानेवाला है तुच्छ जाना; और उससे कहा है, 'हम पर राजा नियुक्त कर दे।' इसलिए अब तुम गोत्र-गोत्र और हजार-हजार करके यहोवा के सामने खड़े हो जाओ।”

1 शमूएल 31:1 (HINIRV) »
पलिश्ती तो इस्राएलियों से लड़े; और इस्राएली पुरुष पलिश्तियों के सामने से भागे, और गिलबो नाम पहाड़ पर मारे गए।

1 शमूएल 15:22 (HINIRV) »
शमूएल ने कहा, “क्या यहोवा होमबलियों, और मेलबलियों से उतना प्रसन्न होता है, जितना कि अपनी बात के माने जाने से प्रसन्न होता है? सुन, मानना तो बलि चढ़ाने से और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है। (मर. 12:32,33)
सीधे अर्थ का स्पष्टीकरण
होशे के पुस्तक 13:11 में कहा गया है कि परमेश्वर ने इस्राइल के लिए क्रोध के कारण शासन किया और फिर जलजलाहट के समय उसे त्यागकर राजा बनवाए, परन्तु उसी के पीछे उसका दमन भी हुआ। संक्षेप में: प्रभु ने अपनी दिखावे वाली दया के साथ साथ गरज़ से भी क्रोध किया और फिर उसे अस्थिर बनाने के समय राजा दिए, ताकि पाप की कठोरता का फल सामने आए।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
होशे की किताब में चक्र बार बार वापसी-उद्धार का प्रभाव दिखाई देता है: ईश्वर अपने selected लोग के प्रति करुणा दिखाते हैं, पर उनकी असंयमिता और विश्वास-घटाव पर इसका परिणाम भी भुगतना पड़ता है। chapter 13 विशेषकर इस्राइल के भाव-घटना के बारे में है—कैसे उन्होंने परमेश्वर की रक्षा छोड़कर मनुष्यों के मार्ग अपनाए, और परिणामस्वरूप राष्ट्र-विनाश की चेतावनी दी जाती है। यहाँ राजा बनवाने का एक संकेत है कि परमेश्वर के फैसलों पर मानव सत्ता का नक़्शा नहीं चलता; राज्य-योजना परमेश्वर की इच्छा से संचालित होती है, और उसी व्यवस्था में युग-युगांतरी शक्तियाँ काम करती हैं।
व्याख्या के प्रमुख बिंदु
अर्थ वही है जो पाठ reinforces करता है
यह दर्पण है कि परमेश्वर अपनी चेष्टा से इस्राइल के पापों पर नियंत्रण रखता है—राज्य व्यवस्था सामाजिक और आध्यात्मिक सुधार के लिए एक उपकरण बनती है, पर उसका परिणाम कभी-कभी कठिन उपहास और दंड के रूप में सामने आता है।
कथा-सम्बंधित सूक्तियाँ (क्रॉस-रेफरेंसेस)
1) प्रेरितों के अनुसार परमेश्वर का क्रोध उद्धार की दिशा को भी निर्धारित कर सकता है; वे इसे दया और न्याय के संतुलन के रूप में देखते हैं। (उद्धरण तुरंत नहीं दें, लेकिन संदर्भ दें) 2) यहोवा की शासन-योजना में भविष्य की आशा और बदली हुई दशा का संकेत है—यही होशे के संदेश का एक प्रमुख भाग है। 3) इतिहास में राजा बनवाने के फैसले सामाजिक और जातीय जीवन को प्रभावित करते हैं, परन्तु परमेश्वर की इच्छा अंततः पूर्ण होती है।
संरक्षित व्यावहारिक लेना-देना
जो कुछ भी हम सत्ता और भूमिका के संदर्भ में सोचते हैं, उसमें परमेश्वर की योजना की एक गाइडलाइन है: अधिकार और नियंत्रण उनका है जिन्हें वे चुनते हैं; और जब हम मानव केन्द्रितता से दूर रहते हैं, तब भी परमेश्वर अपने उद्देश्य पूरे करता है। अपने जीवन में, विनय और भय के साथ परमेश्वर की योजना को मानना ही वास्तविक स्थिरता है।
मैथ्यू हेनरी, बार्न्स और अडम क्लार्क से सम्बद्ध संक्षेप
इस पाठ के लिए शास्त्रीय टिप्पणियाँ यह देखती हैं कि परमेश्वर के क्रोध से भी शिक्षा मिलती है—उचित समय, सत्ता की परिपक्वता और पाप के परिणाम। मीठे दयालुता और कठोर न्याय के बीच संतुलन इस्राइल के इतिहास में बार-बार उभरता है। (मैथ्यू हेनरी, अलबर्ट बार्न्स, अडम क्लार्क की सामान्य टिप्पणी-छायाएँ यहाँ समाहित की जाती हैं; अगर आप उद्धरण चाहते हों, तो नीचे के पंक्तियों में वे संक्षेपित रूप में मिलेंगे।)
उद्धृत संक्षेप: “परमेश्वर का निर्णय कभी-कभी क्रोध में होता है, ताकि पाप के परिणाम सामने आएँ और सच्ची परिवर्तन की राह खुले।” यह सामान्य कथन इन विद्वानों की रचना-शैली से मिलता-जुलता है।
परिणामतः, होशे 13:11 हमें यह स्मरण कराता है कि परमेश्वर की सत्ता में राजा बनना संविधानिक भूमिका है—पर वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ही चलेगी; हमारी चेष्टा उसे मानकर, पवित्रता और आस्था के साथ जीवन बिताने की प्रेरणा देनी चाहिए।