Old Testament
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होशे 5:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
उनके काम उन्हें अपने परमेश्वर की ओर फिरने नहीं देते, क्योंकि छिनाला करनेवाली आत्मा उनमें रहती है*; और वे यहोवा को नहीं जानते हैं।
होशे 5:4 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 5:4 समानांतर पद और संबंधित वचन
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होशे 4:12 (HINIRV) »
मेरी प्रजा के लोग काठ के पुतले से प्रश्न करते हैं, और उनकी छड़ी उनको भविष्य बताती है। क्योंकि छिनाला करानेवाली आत्मा ने उन्हें बहकाया है, और वे अपने परमेश्वर की अधीनता छोड़कर छिनाला करते हैं।

यिर्मयाह 9:24 (HINIRV) »
परन्तु जो घमण्ड करे वह इसी बात पर घमण्ड करे, कि वह मुझे जानता और समझता है, कि मैं ही वह यहोवा हूँ, जो पृथ्वी पर करुणा, न्याय और धर्म के काम करता है; क्योंकि मैं इन्हीं बातों से प्रसन्न रहता हूँ। (1 कुरि. 1:31, 2 कुरि. 10:17)

होशे 5:4 पर टिप्पणी — संदर्भ और केंद्रीय संदेश
पुष्ट रूप से सन्देश यह है कि यहोवा के विरुद्ध रहने वाले महत्त्वपूर्ण दोष—व्यवस्था से हटकर अपने आप को धारण करने वाली आत्मा—मनुष्यों को परमेश्वर की ओर लौटने से रोकती है। होशे की पुस्तक में यह विशेष दृश्य यहोवा के chosen people की धार्मिक चंचलता और अपराधिता को उजागर करता है: वे न धार्मिक परिश्रम से, न सार्वजनिक पूजा से, न ही नैतिक सुधार से अपने खोए हुए संबंध को पुनः प्राप्त कर पाते हैं। शब्द “छिनाला करनेवाली आत्मा” यहाँ उस शक्तिशाली प्रभाव को दर्शाते हैं जो लोगों की चेतना को मंद कर देता है और उनके भीतर के भय या बहकावे के कारण वे यहोवा को नहीं जानते हैं।
मुख्य अर्थ
होशे 5:4 कहता है कि उनके कर्म उन्हें परमेश्वर की ओर फिरने नहीं देते क्योंकि उनमें ऐसी आत्मा है जो “छिनाला" करती है, यानी बहकाती या विमुख करती है। यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर के साथ नैतिकता और सचेत प्रेम के बजाय, आन्तरिक शक्ति ऐसी है जो धार्मिकता के तुष्टिकरण को रोकती है। नतीजा यह है कि वे यहोवा को नहीं जानते और न ही उसकी आवाज सुन पाते हैं।
दो-तीन प्रमुख विषय
Cross-reference (संख्यात्मक रूप से उपयुक्त संदर्भ)
• गलातियों 5:19-21 की तरह आत्म-नियंत्रण की कमी और चरित्रगत दोष यह दिखाती है कि आत्मा के प्रभाव से हृदय कैसे भ्रष्ट हो सकता है। यह होशे के संदेश को व्यवहारिक सावधानी के साथ जोड़ता है।
• रोमियों 8:7-8 में शारीरिक वृत्ति और आत्मिक निष्क्रियता के कारण परमेश्वर की इच्छा से विमुख होना समझ आता है। होशे के संकेत से यह बोध होता है कि केवल बाहरी धर्म नहीं, भीतर की स्थिति भी आवश्यक है।
• योएएल 2:13 में मन परिवर्तन का आह्वान, पाप-ग्रहण से मुक्ति पाने के लिए एक आंतरिक रीढ़ चाहिए—यही वास्तविक फर्क होशे 5:4 में उजागर है।
व्यावहारिक चिंतन
हम स्वयं विचार करें: क्या मेरी आंतरिक प्रेरणा और निर्णय परमेश्वर की ओर मोड़ते हैं, या मैं धीरे-धीरे ऐसी “छिनाला” आत्मा के प्रभाव में जी रहा हूँ? ईमानदारी से आत्म-निरीक्षण करें—क्या भक्ति के रूपकों के भीतर भी सत्यता और भक्तिपूर्ण चेतना विद्यमान है? यदि नहीं, तो प्रार्थना और पवित्र नियम के अभ्यास से हृदय का कण्डक्शन करें ताकि यहोवा की पहचान और प्यार फिर से जाग उठे।
संक्षेप सार
होशे 5:4 यह बताता है कि कुछ आंतरिक शक्तियाँ (छिनाला करनेवाली आत्मा) हमारे निर्णय और परमेश्वर के साथ संबंध को बाधित कर सकती हैं। यह संदेश यह नहीं कि परमेश्वर दूर है, बल्कि यह कि मनुष्य को सचेत रूप से खोए पथ से लौटना पड़ता है। एक विश्वासी के लिए यह आत्म-निरीक्षण और पुनः समर्पण का अवसर है—ताकि हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ और प्रार्थना ईश्वर की ओर कसकर खड़ी रहें।
मुख्य उद्धरण (संश्लेषित): Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से प्रेरित सार: आत्मा की सक्रिय भूमिका और हृदय परिवर्तन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है; सामान्य चेतावनियाँ वही हैं जो ऊपर दिए गए बिंदुओं में समाहित हैं. (चयनित संदर्भ उद्धरण नीचे संक्षेपित रूप में संक्रमित किया गया है.)
छोटी-सी क्रॉस-रेफरेंसें: गलातियों 5:19-21, रोमियों 8:7-8, योएएल 2:13 — के साथ संबद्धता बताती हैं कि आंतरिक परिवर्तन और ईश्वर की पहचान कितनी महत्वपूर्ण हैं।