Old Testament
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हबक्कूक 2:18 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
*खुदी हुई मूरत में क्या लाभ देखकर बनानेवाले ने उसे खोदा है? फिर झूठ सिखानेवाली और ढली हुई मूरत में क्या लाभ देखकर ढालनेवाले ने उस पर इतना भरोसा रखा है कि न बोलनेवाली और निकम्मी मूरत बनाए?
हबक्कूक 2:18 पद-दर-पद बाइबल टीका
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हबक्कूक 2:18 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यिर्मयाह 10:8 (HINIRV) »
परन्तु वे पशु सरीखे निरे मूर्ख हैं; मूर्तियों से क्या शिक्षा? वे तो काठ ही हैं!

यशायाह 42:17 (HINIRV) »
जो लोग खुदी हुई मूरतों पर भरोसा रखते और ढली हुई मूरतों से कहते हैं, “तुम हमारे ईश्वर हो,” उनको पीछे हटना और अत्यन्त लज्जित होना पड़ेगा।

यशायाह 44:9 (HINIRV) »
जो मूरत खोदकर बनाते हैं, वे सबके सब व्यर्थ हैं और जिन वस्तुओं में वे आनन्द ढूँढ़ते उनसे कुछ लाभ न होगा; उनके साक्षी, न तो आप कुछ देखते और न कुछ जानते हैं, इसलिए उनको लज्जित होना पड़ेगा।
हबक्कूक 2:18 पर टिप्पणी — खुदी हुई मूरत के बनावे और उसकी धारणाओं का व्यर्थपन
यह पद हबक्कूक के प्रत्यक्ष संवाद के बीच में धार्मिक अवमानना, बनावट की विषमताओं और निम्म-नीतियों के लिए एक कड़ा चुभता उपदेश है। पंक्ति में उल्लिखित मूरतें—खुदी हुई मूरत, ढली हुई मूरत—भले ही वस्तुतः मनुष्यों की कल्पना और कला की देन हों, पर वे जो भी देख-भाल और भरोसा इन पर किया जाता है, वह खोखला और निरर्थक माना गया है जब वे सच्चे ईश्वर के स्थान को भर नहीं पातीं। यह पाठ आता है कि जो लोग पत्थर-लौह या सुगठित रूपों में ईश्वर की उपस्थिति ढूंढते हैं, वे वास्तविक आत्मिक सत्य से विमुख रहते हैं।
पर्व का संकल्पना-सूत्र: अध्याय के भीतर का स्थान
हबक्कूक के अध्याय 2 में तीन प्रश्न उठते हैं: गलत दिमाग से बनायी गयी चीजों पर भरोसा करना, ढलाई गई मूरतों और उनका प्रभाव, और ईश्वर के न्याय का आना। यह verses उन लोगों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी हैं जो धार्मिक रूप से दिखावे और गुणवत्ता पर ज़ोर देते हैं परन्तु ईश्वर के असल में नहीं मिलते। इस verse में मूर्ति-पूजा के साथ विश्वास का मूल्यांकन किया गया है—मूर्ति से मिलने वाला ‘लाभ’ वास्तविक प्रभाव नहीं देता; बल्कि उसका खोखलापन सामने आता है।
मुख्य सीख (Spiritual Lesson)
अनुकरणीय गूढ़ विचार (Cross-references)
- रोम 1:23-25 दर्शाता है कि मानव ने ईश्वर की महिमा से चक्कर खाकर अपयश को अपनाया, और बदली हुई मूरतों के पीछे गया। यह स्पष्ट करता है कि प्रकृत आत्मा में मूरतें नहीं बल्कि सच्ची आराधना की दिशा महत्वपूर्ण है।
- 1 कुरिन्थ 10:14-20 में मूर्ति-पूजा के बारे में स्पष्ट चेतावनी है कि जो भागीदारी आत्मा के साथ है, वह ईश्वर-सेवा से भिन्न है और यह एक असमान दूरी बनाती है।
- व्यवहारिक दृष्टि से स्तोत्रPs 115:4-8 यह बताता है कि मूर्तियाँ मनुष्यों के हाथों से बनी चीजें हैं और उनके स्वरूप, क्षमता, और सुनवाई-चेतना नहीं होती—यह भी इस पाठ के साथ संगत है कि मूर्तियाँ भक्ति नहीं दे सकतीं।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
अपने विश्वासी जीवन में इस verses से दो महत्वपूर्ण नज़रिए निकलते हैं। पहले, यह याद दिलाता है कि अपने आस्था-निष्ठा के केन्द्र को ईश्वर के अनावरण के साथ जोड़ा जाए, न कि किसी बाहरी प्रस्तुति या कला-कृति के भरोसे। दूसरे, यह प्रेरित करता है कि जिन चीजों से हमें “लाभ” दिखे, वे वास्तव में आत्मिक लाभ दे रही हों, यह अक्सर असमान होता है; इसलिए हमें आत्मिक विवेक से देखना चाहिए कि हमारा मार्ग किस ओर जा रहा है।
संक्षेप
हबक्कूक 2:18 कहता है कि जो खुदी हुई मूरत और ढली हुई मूरत पर भरोसा रखते हैं, वे व्यर्थ की चीजों में स्थायित्व खोजते हैं। सच्चीउद्धार और आस्तिक जीवन का आधार परमेश्वर है; मूर्तियां न बोल सकतीं, न सुन सकतीं, न मार्ग दिखा सकतीं। यह वाणी हमें सच्ची आराधना की ओर बुलाती है—ईश्वर के साथ व्यक्त संबंध और उसकी सartha/धर्मिक मार्गदर्शन पर स्थायित्व बनाए रखना।
नोट: इस commentary में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के कुछ संक्षिप्त विचारों के विशिष्ट उद्धरण उपलब्ध नहीं हैं, पर उनके समकालीन बाइबिल-टिप्पणियों की सोच का समन्वय किया गया है—यही एकीकृत दृष्टिकोण पाठ की गहराई को बढ़ाता है।