Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 11:1 यिर्मयाह 11:2 यिर्मयाह 11:3 यिर्मयाह 11:4 यिर्मयाह 11:5 यिर्मयाह 11:6 यिर्मयाह 11:7 यिर्मयाह 11:8 यिर्मयाह 11:9 यिर्मयाह 11:10 यिर्मयाह 11:11 यिर्मयाह 11:12 यिर्मयाह 11:13 यिर्मयाह 11:14 यिर्मयाह 11:15 यिर्मयाह 11:16 यिर्मयाह 11:17 यिर्मयाह 11:18 यिर्मयाह 11:19 यिर्मयाह 11:20 यिर्मयाह 11:21 यिर्मयाह 11:22 यिर्मयाह 11:23



यिर्मयाह 11:4 का संदर्भ और मुख्य अर्थ
यह वाक्य भगवान के साथ अविस्मरणीय अनुबंध की स्मृति के रूप में आता है। यिर्मयाह को सूना दिया गया है कि किन्हीं कठिन समयों के बीच भी ईश्वर ने अपने लोगों से वे वचन मानने की अपेक्षा रखी—जिन्हें पूर्वजों के समय मिस्र के दासत्व से मुक्त करते समय दिये गये थे। यहाँ कहा गया है कि वे “लोहे की भट्ठी” जैसी कड़ी परीक्षा से गुजर रहे थे, और उनमें से प्रत्येक के लिए परमेश्वर ने एक संकल्पना स्पष्ट की: मेरी सुनो, और जितनी आज्ञाएँ मैं तुम्हें देता हूँ उन सभी का पालन करो। इससे वे मेरी प्रजा ठहरेंगे और मैं उनका परमेश्वर ठहरूंगा।
मुख्य तात्पर्य
परमेश्वर अपने अनुयायियों के साथ अपने पुराने पवित्र संबंध की याद दिलाते हैं: विश्वास-यज्ञ और सुनने-वचन की बाधकता के पीछे एक निश्चित सुरक्षा है। यह संदेश बताता है कि ईश्वर के वचन मानना सिर्फ बाहरी कर्म नहीं, बल्कि उनके साथ एक जीवित और प्रबल संबंध है। जहां उनींदेपन या जड़ता से दूर रहने की आवश्यकता है, वहीं वचन के अनुसार जीवन जीने की प्रतिबद्धता पुनः स्थापित होती है।
कुंजी विषय
Cross-References (संक्षिप्त स्पर्श)
इन संदर्भों में轻ंद जीवन-निर्देश और समुदाय की पहचान से जुड़ा विचार स्पष्ट होता है: ईश्वर के साथ सचेत और समर्पित जीवन जीना उन कठिन समयों में भी एकत्रित सुरक्षा देता है।
वैचारिक अनुभव और व्यावहारिक विचार
आज के पाठक के लिए इसका संदेश स्पष्ट है: अपने विश्वासी जीवन में जो वचन परमेश्वर ने उजागर किए हैं, उन्हें गहराई से स्वीकारें और प्रतिदिन के निर्णयों में लागू करें। चाहे समाज में दबाव हो, निजी स्वार्थ हो या परिस्थितियाँ कठिन हों, परमेश्वर के नियमों के अनुरूप चलना व्यक्ति और समुदाय की स्थिरता बनाता है।
संक्षिप्त सार
यिर्मयाह 11:4 दोहराता है कि भगवान ने अपने क़ायदे-कानूनों के अनुसार चलना ही सुरक्षा, पहचान और धार्मिक जीवंतता का स्रोत है। यह वचन-आज्ञा हमें सच्ची प्रजा बनने के लिए प्रेरित करती है—और ईश्वर के साथ एक प्रमाणित संबंध की दिशा दिखाती है।
प्राथमिक संदर्भ-चिन्ह: “जो मैंने तुम्हारे पुरखाओं के साथ लोहे की भट्ठी अर्थात् मिस्र देश में से निकालने के समय, यह कहकर बाँधी थी, मेरी सुनो, और जितनी आज्ञाएँ मैं तुम्हें देता हूँ उन सभी का पालन करो।”
नोट: नीचे उद्धृत एक-दो अनुभाते Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के समान्य विचार धाराओं से मिलते-जुलते सार-सामग्री को समाहित किया गया है, और पूर्ण उद्धरण के बजाय संक्षिप्त संकेत दिए गए हैं ताकि पाठ एकीकृत और सहज लगे।