Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 11:2 — तत्कालीन संदर्भ और मूल संदेश
इस वाचा के पहले भाग में दाता-यिर्मयाह को परमेश्वर ने यहूदा के लोगों और यरूशालेम की सत्ता-प्रतिष्ठाओं के सामने संदेश伝 देने के लिए भेजा। वे लोग जो परमेश्वर के साथ अपने पक्ष-सम्बन्ध के अनुसार रहते थे, उनके लिए यह चेतावनी और आह्वान है कि वे अपनी सत्ता, अंधविश्वास और पाप-निष्ठा को त्याग दें। यह वाक्य सीधे तोर पर एक सार्वजनिक उद्घोषणा है: सुनो और गति करो।
ईश्वर के बारे में पाठ से स्पष्ट प्रकाश
यह वचन दिखाता है कि परमेश्वर संतप्त, परंतु धैर्यवान शासक हैं जो अपने लोगों की आचरण-भंग पर ध्यान देते हैं। वह आवाज देता है—ताकि लोग झुकें, सत्य को पहचानें, और अपने पापों का पश्चात्ताप करें। यह पाठ यह भी संकेत देता है कि ईश्वर अपने कानून और वादों के प्रति सदा-सदा के लिए प्रतिबद्ध रहते हैं; वे न्याय और अनुग्रह के संतुलन के साथ प्रचार-प्रचार करते हैं ताकि लोग सच्ची राह अपनाएं।
शब्दों और प्रतीकों की स्पष्ट व्याख्या
- “वाचा” का अर्थ यहाँ परमेश्वर की उद्घोषणा है जो यिर्मयाह के माध्यम से प्रकाशित होती है; यह केवल शब्द नहीं बल्कि आचरण की मांग है।
- “यहोदा के पुरुषों और यरूशलेम के रहनेवालों” से संकेत मिलता है कि यह संदेश सीधे उन पर है जो परमेश्वर के विवेक से दूर रहते हैं और समाज के नेतृत्व में हैं।
संबंधित आयतें (क्रॉस-रेफरेंसेस) और उनके तात्पर्य
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर अपने लोगों के लिए एक स्थाई नैतिक मानक बनाए रखते हैं और परिवर्तन को इच्छित मानते हैं जब तक वे पश्चात्ताप कर मार्गशीर्षता अपनाते हैं।
टेक्स्ट और विश्वास पर आधुनिक अनुप्रयोग
आज के संदर्भ में यह संदेश याद दिलाता है कि सार्वजनिक आस्था और निजी चरित्र एक साथ नहीं चलना चाहिए। यदि हम समाज के भीतर नेतृत्व कर रहे हों, तो हमारी निर्भीक सत्यनिष्ठा, करुणा और न्यायपरक निर्णयों परिपूर्ण हों; नहीं तो परमेश्वर की चेतावनियाँ फिर भी संवाद के रूप में टूटती नहीं हैं।
संक्षेप प्रस्तुतक
यिर्मयाह 11:2 हमें स्मरण कराता है कि परमेश्वर की वाणी सुनकर उसे मानना और पालन करना हमारा उत्तरदायित्व है। धार्मिक गतिविधियाँ जितनी सतही न हों, हृदय-पथ पर ईमानदार परिवर्तन ही कृपा का मार्ग खुलता है।
नोट: नीचे उद्धृत संरचना के लिए Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-domain सिन्टक्स के छोटे-से उद्धरण आवश्यकतानुसार शामिल हैं:
प्रमुख उद्धरण (संयुक्त सार के रूप में):
संदर्भित पंक्तियाँ और उनकी छोटी व्याख्या ऊपर दी गई क्रॉस-रेफरेंसेस से मेल खाती हैं, ताकि पाठक को पाठ के बहुविध आयाम स्पष्ट हों।