Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
विलापगीत 1:1 विलापगीत 1:2 विलापगीत 1:3 विलापगीत 1:4 विलापगीत 1:5 विलापगीत 1:6 विलापगीत 1:7 विलापगीत 1:8 विलापगीत 1:9 विलापगीत 1:10 विलापगीत 1:11 विलापगीत 1:12 विलापगीत 1:13 विलापगीत 1:14 विलापगीत 1:15 विलापगीत 1:16 विलापगीत 1:17 विलापगीत 1:18 विलापगीत 1:19 विलापगीत 1:20 विलापगीत 1:21 विलापगीत 1:22



मुख्य व्याख्या प्वाइंट
यह वलापगीत 1:18 में यहोवा के प्रति एक गहरी स्मरण दिलाने वाला निजी-व्यथा सन्देश है—याने यहोवा की सच्चाई पर है और मेरी अवज्ञा ने दुखद परिणाम दिए हैं। कवि अपनी असफलताओं के बावजूद भरोसा करता है कि यहोवा सत्य है और उसकी आज्ञाओं का पालन न करने के परिणाम स्पष्ट हैं। संदेश यह है कि दुष्कर्म के कारण बंधन और पीड़ा आती है, परन्तु यहोवा की सच्चाई और दया संभवतः पुनःोलम्बन का मार्ग दिखाती है।
साहित्यिक पृष्ठभूमि
यहालेव की विलापगीतों में पात्र का दुख, सामुदायिक-व्यथा और शास्त्र-आमंत्रण एक साथ चलता है। यहाँ कवि अपने दोषों को स्वीकार कर रहा है और यहोवा की नीति के सामने आत्म-समर्पण कर रहा है कि उसकी पीड़ा में भी यहोवा की सत्यता स्पष्ट है। कुमार और कुमारियाँ का बंधुआई में जाना सामूहिक पतन के संकेत हैं, जो यहूदियों के इतिहास में बार-बार दिखाई देते रहे हैं, जब वे अस्वीकार करते हैं और नतीजे भुगतते हैं।
स्थूल theological संकेत
1) यहोवा सच्चाई पर है: परमेश्वर की नैतिकता अद्वितीय और अपरिवर्तनीय है; उसके निर्णय और राज-कार्य निष्कपट सच बोलते हैं। यह उद्धार के लिए आशा का आधार बनता है—कष्ट के बीच भी परमेश्वर अपनी वफादारी नहीं छोड़ते।
2) मैंने उसकी आज्ञा का उल्लंघन किया है: व्यक्तिगत दोष और सामूहिक उथल-पुथल का संयोजन। यह धारणा बताती है कि व्यक्तिगत अवज्ञा सामाजिक परिणामों को जन्म देती है, तथा पाप का दंश देह-समूह दोनों पर पड़ता है।
3) मेरे कुमार और कुमारियाँ बँधुआई में चली गई हैं: दासत्व की भाषा में आंतरिक निराशा, राज्य-यात्रा की गति में गिरावट और बहिर्गमन के संकेत; God के शासन में कानून-त्याग के परिणामों का चित्रण।
पवित्रशास्त्रीय संबंध
— यहोवा की सच्चाई और पवित्रता के प्रत्यक्ष संकेत अन्य प्रत्यक्ष ग्रंथों में भी मिलते हैं, जैसे सुसंहित ज्ञान में कि परमेश्वर न्यायी है और भलाई का स्थान बनाते हैं।
— व्यक्तिगत दोष का समुदाय पर प्रभाव: दुष्कर्म का दुष्परिणाम परिवार, नगर और राष्ट्र तक फैलता है, जो पुरानी व्यवस्था के चेतावनी-आख्यानों से मेल खाता है।
प्रतिबिम्बित प्रश्न (Reflection Questions)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यहोवा की सच्चाई और法规 के भीतर, अपनी अवज्ञा के परिणामों को पहचानना ही इस विलाप का केंद्रीय संदेश है। फिर भी परमेश्वर की सच्चाई से आशा और सुधार का मार्ग खुलता है, क्योंकि दायित्व-स्वीकृति के साथ पीड़ा भी उद्धार की दिशा में मोड़ लेती है।
cross-references (संक्षिप्त निष्कर्ष के साथ)
1) यिर्मयाह 31:3-4 — परमेश्वर की प्रेम-निष्ठा और उद्धार-योजना, जहाँ दयालु प्रेम स्थाई रहता है।
2) लूका 4:18-19 — मसीही उद्धार का उद्घोष, दयालुता और किन्हीं बंधनों से मुक्त होना।
3) यशायाह 61:1-2 — शोक-समाचार की घोषणा और द्यूत-विश्वास का पुनर्निर्माण।
महत्वपूर्ण उद्धरण (पुष्टि के लिए)
यह लेख Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-domain टिप्पणी-पत्रों से गूंजते संकेतों के साथ एकीकृत किया गया है। नीचे छोटे-छोटे उद्धरणों का उपयोग किया गया है:
— Henry से: यहोवा सत्य है; उसकी व्यवस्था क्रूर नहीं, बल्कि उद्धार-प्रेरक है।
— Barnes से: दंड और दया दोनों एक साथ चलते हैं; अवज्ञा ने दुष्कर परिणाम दिए।
— Clarke से: परमेश्वर की सच्चाई परमांत-नियंत्रकता के साथ जुड़ी है; पश्चात्ताप से स्वर्गीय आशीषों को बुलावा मिलता है।