मीका 3:4 बाइबल पद की व्याख्या
मीका 3:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
वे उस समय यहोवा की दुहाई देंगे, परन्तु वह उनकी न सुनेगा, वरन् उस समय वह उनके बुरे कामों के कारण उनसे मुँह मोड़ लेगा।
मीका 3:4 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मीका 3:4 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 1:15 (HINIRV) »
जब तुम मेरी ओर हाथ फैलाओ, तब मैं तुम से मुख फेर लूँगा; तुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करो, तो भी मैं तुम्हारी न सुनूँगा; क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं। (नीति. 1:28, मीका. 3:4)

भजन संहिता 18:41 (HINIRV) »
उन्होंने दुहाई तो दी परन्तु उन्हें कोई बचानेवाला न मिला, उन्होंने यहोवा की भी दुहाई दी, परन्तु उसने भी उनको उत्तर न दिया।

नीतिवचन 1:28 (HINIRV) »
उस समय वे मुझे पुकारेंगे, और मैं न सुनूँगी; वे मुझे यत्न से तो ढूँढेंगे, परन्तु न पाएँगे।
लीনमीका 3:4 - सीधे शब्दों में अर्थ
इस पद का मूल संदेश है: जब लोग कठिनाइयों और संकट के समय Yahweh की दुहाई देते हैं पर उसके कान नहीं सुनते, तो वह उनके बुरे कर्मों के कारण उनसे पलायन कर लेता है। अर्थात् हलचल भरे वक्त में बनती प्रार्थनाओं की कड़ियाँ भी अगर पाप के कारण टूट जाएँ, तो उद्धार का मार्ग अवरुद्ध हो सकता है।
प्रसंगवृत्ति और संदर्भ
मीका की पुस्तक के अध्याय 3 में भविष्यद्वक्ता मीका इस्राइल के नेताओं और धर्मग्रन्थ-धारियों पर भ्रष्टाचार, अन्याय और दमन के विरुद्ध कठोर चेतावनी देते हैं। अध्याय 3 का भाग आम लोगों और नेताओं के बीच एक विभाजन दिखाता है: जो धर्म के नाम पर दबाव डालते हैं और शुध्द आचरण नहीं अपनाते, वे ईश्वर की आशा से दूरी बनाते हैं। इस verse में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सतर्क आह्वान के बावजूद ईश्वर उनका साथ नहीं देंगे क्योंकि उनका बुरे कर्म उनके अधिकार-प्रथाओं से ओझल नहीं होते।
व्याख्यात्मक अवलोकन
विषय-वस्तु के संकेत (संक्षेप)
अन्य बाइबल संदर्भ (संक्षिप्त परिचय)
1) इस्राइल के निष्कासन के प्रसंग में—कहता है कि भक्ति के साथ साथ न्याय और दया भी आवश्यक है; 2) यिर्मयाह 7:ฉ—भरोसा अंधकार में भी पथ नहीं दिखाता यदि लोग पाप से निपट नहीं पाते; 3) कपटी पंथों के विरुद्ध न्याय का आग्रह अपने समय पर पूरा होता है।
कथन और अन्य प्रेरक टिप्पणी
मत्ती हेन्री (Matthew Henry) और अल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes) के संकलन से उद्धृत नहीं हैं, पर उनके समान दृष्टिकोण इस संकट में निर्मल आचरण और ईश्वरीय न्याय की आवश्यकता पर जोर देते हैं: यदि समाज पाप से मुक्त नहीं होता, तो परमेश्वर की सहायता स्थिर नहीं रहेगी।
संक्षिप्त क्रॉस-रेफरेंसेस
1) होशे 5:6 — भक्ति का उपाय केवल outward चिह्न नहीं, आंतरिक परिवर्तन चाहिए; 2) मत्ती 7:21 — भगवान के नाम से आह्वान तब तक प्रभावी नहीं जब जीवन में प्रत्यक्ष पालन नहीं है; 3) यशायाह 1:15–17 — कर्मकरों के साथ आस्था की वास्तविकता करनी चाहिए।
व्यावहारिक निष्कर्ष
यदि आप सच्चे धर्म के साथ रहते हैं, तो प्रार्थना और आचरण दोनों एक साथ चलते हैं। पाप के आग्रह के विरुद्ध साहसपूर्वक खड़ा होना परमेश्वर के साथ स्थायी संबंध बनाता है, और तबही ईश्वर की सहायता संभव बनती है।