Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीमीका 6:1 बाइबल पद की व्याख्या
मीका 6:1 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
जो बात यहोवा कहता है, उसे सुनो उठकर, पहाड़ों के सामने वाद विवाद कर, और टीले भी तेरी सुनने पाएँ।
मीका 6:1 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मीका 6:1 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मीका 1:2 (HINIRV) »
हे जाति-जाति के सब लोगों, सुनो! हे पृथ्वी तू उस सब समेत जो तुझ में है, ध्यान दे! और प्रभु यहोवा तुम्हारे विरुद्ध, वरन् परमेश्वर अपने पवित्र मन्दिर में* से तुम पर साक्षी दे।


मीका 6:1 — immediate setting
यहोवा का संदेश मीका के समय की कानाफूसी पुष्टि के साथ आता है। यह शुरुआत अदालत की तरह है—यहोवा परमेश्वर अपने लोगों के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने समाज के नागरिकों के साथ न्याय-न्याय की मांग करते हैं। पहाड़ों से सुनवाई की माँग नहीं, बल्कि वह कह रहे हैं कि उठिए और कृपा-आचरण के सामने अपने दोषों का सामना कीजिए; टीले व गगनचुम्बी चोटियाँ भी सारथी बनकर सुनें। यह एक सार्वजनिक, आध्यात्मिक परीक्षण का उद्घोष है, जिसमें लोगों को अपने व्यवहार की जवाबदेही स्वीकार करनी होगी।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ का संदेश
यह प्रवचन दिखाता है कि परमेश्वर न्याय के साथ निकट हैं और वह अपना अभिषिक्त समुदाय बुलाते हैं—ताकि वे अपने आचरण, सामाजिक व्यवहार और धर्म-संस्थाओं का सही ढंग से मूल्यांकन करें। “जो बात यहोवा कहता है, उसे सुनो” से स्पष्ट हो जाता है कि धर्म सत्यापन, प्रत्यक्ष मानवीय परिश्रम, और ईमानदार नीतियों के साथ जुड़ा है। यह व्यक्तिगत समर्पण नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व का आह्वान है: भेदभाव, अन्याय या दिखावे के बिना एक सत्यनिष्ठ जीवन जीना।
मुख्य शब्दों और चित्रों की व्याख्या
Related passages (संलग्न संदर्भ)
1) यिर्मयाह 6:16—यहोवा के मार्ग पर चलने की पुकार के साथ स्थिर मार्ग की परंपरा; 2) अमोस 5:24—न्याय और प्रेम की वास्तविकता का आग्रह; 3) मत्ती 7:24-27—व्यवहार-आधारित घर बनाम रेत का घर।
इन संदर्भों में दिखता है कि धर्म सिर्फ कथन नहीं, बल्कि कर्मों का समन्वय है; यह मानवीय जीवन के हर क्षेत्र में सत्य और न्याय की मांग है।
जो सुझाव आज के लिए प्रासंगिक है
Cross references और सार
परिचित कोटेशन इन प्रवचनों की गहराई को रेखांकित करते हैं: इनका आशय है कि ईश्वर के सामने वास्तविक प्रश्न है—हम कैसे जीते हैं और कैसे समाज में सच, प्रेम और न्याय को स्थापित करते हैं।
निष्कर्षतः मीका 6:1 का संदेश कहता है कि परमेश्वर अपने लोगों को अपने आचरण की जाँच के लिए बुलाते हैं—बिलकुल सरल शब्दों में: ईमानदार, साहसपूर्ण और क्रियात्मक विश्वास की आवश्यकता है, ताकि समाज में न्याय और करुणा बनी रहे।