Old Testament
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मीका 5:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और मैं अन्यजातियों से जो मेरा कहा नहीं मानतीं, क्रोध और जलजलाहट के साथ बदला लूँगा।
मीका 5:15 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मीका 5:15 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मीका 5:8 (HINIRV) »
और याकूब के बचे हुए लोग जातियों में और देश-देश के लोगों के बीच ऐसे होंगे जैसे वन-पशुओं में सिंह, या भेड़-बकरियों के झुण्डों में जवान सिंह होता है, क्योंकि जब वह उनके बीच में से जाए, तो लताड़ता और फाड़ता जाएगा, और कोई बचा न सकेगा।

2 थिस्सलुनीकियों 1:8 (HINIRV) »
और जो परमेश्वर को नहीं पहचानते, और हमारे प्रभु यीशु के सुसमाचार को नहीं मानते उनसे पलटा लेगा। (भज. 79:6, यशा. 66:15, यिर्म. 10:25)

मीका 5:15 का महत्व और संदेश
मेका की पुस्तक में भविष्यवाद और नैतिक निर्देश एक साथ मिलते हैं। मीका 5:15 का वाक्य विशेषकर तब उभरता है जब ईश्वर के लोग परिशोधन के चरण में होते हैं, और वह चेतावनी देते हैं कि किस प्रकार अन्यजातियाँ भी उसी चपत का अनुभव करेंगी जो वे अपने प्रतिद्वंद्वियों पर लाते हैं। यह एक कठोर लेकिन आवश्यक हिंट है कि परमेश्वर के न्याय की सत्ता सबके ऊपर है, और उनका क्रोध उन सभी के लिए लागू होता है जो उनकी आज्ञाओं को तुच्छ मानते हैं।
कौन-सी परिस्थिति इस आयत के पीछे है
मेका 5:15, उस समय की फरीसी-राजनीति और कमजोर शासन-व्यवस्था का आलोचनात्मक चित्र प्रस्तुत करता है जब ईश्वर का चयनित काुटुुब (आम तौर पर योधाओं के स्थान) असूचित रहता है। परमेश्वर का उद्देश्य यह नहीं कि वह प्रतिशोध से संसार को नष्ट करे, बल्कि वह बुराई के अंत और न्याय के स्थापित शासन की ओर संकेत करता है। यह आयत बताती है कि जो लोग ईश्वर की बात नहीं मानते, उन्हें भी उनका स्वरूप-नियंत्रण और निर्णय का डर रहता है, साथ ही यह नसीहत देता है कि क्रोध और जलजलाहट से छुटकारा नहीं, बल्कि उनकी दया और सत्य के अनुसार परिवर्तन ही वास्तविक इलाज है।
प्रधान विचार
इस आयत का मूल संदेश है: ईश्वर के निर्णय सार्वभौमिक और निष्कपट हैं; जो लोग उसकी योजना से विचलित होते हैं वे अपने समय-परिणामों के लिए तैयार रहें। साथ ही यह भी कि दण्ड क्रोध के बिना आध्यात्मिक परिवर्तन के माध्यम से ही जाता है—जो लोग प्रतिशोध की जगह पथ-परिवर्त को स्वीकारते हैं, वे उद्धार को पा सकते हैं।
मुख्य विषय और विषयगत संकेत
संदर्भ-सहयोगी आयतें
1) समान्य न्याय: अन्य आयतें यह स्मरण कराती हैं कि परमेश्वर सब कुछ देखता है और न्याय का दिन निष्कपट होकर आएगा।
2) दया और क्षमा: पुराने नियम-उद्धरणों में दया के साथ न्याय की balance दिखती है; मन में परिवर्तन का स्थान अधिक है।
3) राष्ट्र-न्याय के सिद्धांत: समाज-व्यवस्था में प्रेम और सत्य के साथ शासित होना परमेश्वर की योजना के अनुरूप है।
पवित्र-दर्शनों के क्रॉस-रेफरंस (संक्षेप में)
-meka 4–5: अस्थिरता के बीच ईश्वर की वसूली और राष्ट्रों के प्रति न्याय; संपूर्ण उद्धार की आशा.
यशैया 26:9—ध्यान और न्याय की पीड़ा के साथ उद्धार की दृष्टि।
रोमियों 12:19—“आशीषण का प्रतिशोध मुझे नहीं छोड़ना”—परिचित सत्य कि मलिक के निर्णय में दया और न्याय दोनों हैं।
हिंदी में संक्षिप्त अवलोकन
यह आयत हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर के क्रोध और जलजलाहट केवल अंधकारपूर्ण दमन नहीं, बल्कि बुराई के अंत के साथ नये युग की शुरुआत का संकेत भी है। किन्तु प्रभु का उद्देश्य दया से परिवर्तन को प्रोत्साहित करना है—ताकि लोग अपनी राह छोड़कर सच पर चलें।
व्यावहारिक devotional विचार
यदि आप अपनी आत्मा में क्रोध या बदला लेने का विचार पाते हैं, तो मीका 5:15 की याद दिलाती है कि परमेश्वर की राह दया, विनम्रता और विश्वास-परिवर्तन की है। अपने जीवन के अंदर किसी भी अन्याय के लिए ईश्वर के न्याय के भरोसे रहें, और अपने हृदय को दया और क्षमा के लिए खोलें।