Old Testament
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मीका 6:12 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
यहाँ के धनवान लोग उपद्रव का काम देखा करते हैं; और यहाँ के सब रहनेवाले झूठ बोलते हैं और उनके मुँह से छल की बातें निकलती हैं।
मीका 6:12 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
मीका 6:12 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 1:23 (HINIRV) »
तेरे हाकिम हठीले और चोरों से मिले हैं। वे सब के सब घूस खानेवाले और भेंट के लालची हैं। वे अनाथ का न्याय नहीं करते, और न विधवा का मुकद्दमा अपने पास आने देते हैं।

यिर्मयाह 9:8 (HINIRV) »
उनकी जीभ काल के तीर के समान बेधनेवाली है, उससे छल की बातें निकलती हैं; वे मुँह से तो एक दूसरे से मेल की बात बोलते हैं पर मन ही मन एक दूसरे की घात में लगे रहते हैं।

होशे 7:13 (HINIRV) »
उन पर हाय, क्योंकि वे मेरे पास से भटक गए! उनका सत्यानाश हो, क्योंकि उन्होंने मुझसे बलवा किया है! मैं तो उन्हें छुड़ाता रहा, परन्तु वे मुझसे झूठ बोलते आए हैं।
मीका 6:12 पर टिप्पणी: धनवानों के दुष्कृत्य और झूठ
इस páसद की पहली बात सीधे कहती है: यहाँ के धनवान लोग उपद्रव का काम किया करते हैं और उनके मुँह से छल की बातें निकलती हैं। इसका उद्देश्य सामाजिक विषमता और नैतिक गिरावट की पहचान करना है, जहाँ समृद्धि का दुरुपयोग करके लोग अन्याय करते हैं या सत्य से नहीं; अपने स्वार्थ के लिए झूठ बोलते हैं।
पश्चिमी संदर्भ-संदर्भ और पृष्ठभूमि
मीका के समय यथार्थ स्थिति थी जब भाग्यशाली और गरीब के बीच खाई बढ़ती जा रही थी। राजनीतिक-आर्थिक दबावों के बीच ईश्वर के न्याय के लिए सच बोलना कठिन हो गया था; और धन के प्रभाव से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दबाव बनते थे। यहाँ "धनवान" और "झूठ" दोनों मिलकर निरीक्षण का विषय बनते हैं—एक सामाजिक, नैतिक प्रश्न जो ईमानदारी और न्याय की कमी को उजागर करता है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
वाचन-आधारक टिप्पणियाँ
मत्ती-हेनरी, ऐबर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के सार्वजनिक-डायरे-टिप्पणियों में इस प्रकार के दुराचार पर चेतावनी दी गई है: धन के साथ नैतिक संयम की कमी, और भाषण में सत्य की कमी—ये दोनों मिलकर धार्मिक समुदाय के भीतर अविश्वास पैदा करते हैं। मिसाल के तौर पर, वे देखते हैं कि बाहरी धार्मिकता भले दिखे, पर भीतरी पाप से समाज अस्थिर हो सकता है।
संश्लेषित उद्धरण (संरक्षित)
यदि आप पुराने नैतिक विवेचन से सहमत हों तो निम्न सार-उद्धरण उपयोगी हो सकता है (सार का संदर्भ):
क्रॉस-रेफरेंस और उनका संक्षिप्त परिचय
– यशाया 1:23: देशी अधिकारियों के भ्रष्टाचार और औचित्य के अभाव पर टिप्पणी देता है; असमानता के कारण सामाजिक असंतोष बढ़ता है।
– मीका 3:11: नेता-उपस्थितियों में भ्रष्टाचार और झूठ के साथ दंड के भय के बिना आलोचना नहीं होती।
– इब्रानी 10:22-23: सत्य के आत्म-सम्पन्न और साफ़ दिल से approaching करने की प्रेरणा देता है—झूठ से मुक्त रहने का आह्वान।
इन संदर्भों से पता चलता है कि सत्य और न्याय ही सामाजिक स्थिरता के पीछे मज़बूत स्तम्भ हैं, न कि धन या बाहरी धर्म-दिखावे से।
संक्षिप्त व्यवहारिक takeaway
इस पंक्ति में ईश्वर के न्याय की वास्तविक मांग स्पष्ट है: धन के बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि दिल की ईमानदारी और शब्दों की सच्चाई से समाज की दशा सुधरेगी।