Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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गिनती 23:11 — immediate setting
बालाक राजा ने बिलाम से यह पूछा कि उसने क्या किया है, क्योंकि उसने बालाक के इरादे के विपरीत काम किया। बालाक ने बिलाम से मन्नत मांगी थी कि वह इस्लाह के लिए श्राप दिलवाए, परन्तु बिलाम आशीष ही आशीष देता रहा। यह घटना संदर्भित करती है कि परमेश्वर की योजना मानवीय योजनाओं से ऊपर है और उसकी कृपा कभी विपक्षी के अनुरोध के अनुरूप नहीं बदलती।
ईश्वर पर विश्वास और निष्ठा का पाठ
यह पाठ हमें सिखाता है कि परमेश्वर की नियति मनुष्य की धारणाओं से परे है। बिलाम को पैसे और राजनीतिक लाभ के लिए बुलाया गया था, परन्तु परमेश्वर ने सच बोलकर आशीष ही दिया। यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर के आशीष के स्रोत चयनित व्यक्ति नहीं, बल्कि उसकी इच्छा और सत्यता है।
महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की स्पष्टता
संबद्ध कटूत जड़
यहाँ से मिलते हैं mauve cross-references जो इस अध्याय के भीतर कहाँ कैसे परमेश्वर की प्रतिज्ञा और आशीष का ठहराव दिखाते हैं:
संक्षेप में, आशीष बनाम श्राप के इस विरोध में परमेश्वर की सच्ची इच्छा प्रमुख है, और यह विश्वासयोग्य मनुष्य के लिए अत्यंत प्रेरक है कि ईश्वर के मार्ग श्रेष्ठ और अटूट रहते हैं।
आज के संदर्भ में अनुप्रयोग
हममें से कई बार ऐसे समय आते हैं जब कार्य योजनाएं हमारे हिसाब से नहीं चलते; तब भी ईश्वर की आशीष और सुरक्षा स्थिर रहती है। किसी के दबाव या स्वार्थ से नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हमारा आशीष मिल सकता है। विश्वास के साथ:
टीका-आमतौर पर उद्धरण (चयनित)
नोट: नीचे केवल Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सुरक्षित सार्वजनिक-डोमेन उद्धरणों के छोटे भाग उल्लेखित हैं, यदि उपलब्ध हों।
“God is not bound to do what men expect; He will do what is right.” (कथा-संदर्भ के अनुरूप सामान्य विचार)
संक्षिप्त संदर्भ
Cross-references: गिनती 22–24; भजन 2; व्यवस्थाविवर 12. यह पंक्तियाँ परमेश्वर के नियोजन के ऊपर मानवीय योजनाओं की सीमाओं को दर्शाती हैं और यह बताती हैं कि आशीष वही देता है जो उसकी दिव्य इच्छा में है।
निष्कर्ष: इस verse में दिखी प्रेरणा यही है कि विश्वासयोग्य जीवन में परमेश्वर की आशीष सर्वोपरि है, और मानव प्रयास या शत्रुओं की चाल उसे पलट नहीं सकतीं।