Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
गिनती 1 गिनती 2 गिनती 3 गिनती 4 गिनती 5 गिनती 6 गिनती 7 गिनती 8 गिनती 9 गिनती 10 गिनती 11 गिनती 12 गिनती 13 गिनती 14 गिनती 15 गिनती 16 गिनती 17 गिनती 18 गिनती 19 गिनती 20 गिनती 21 गिनती 22 गिनती 23 गिनती 24 गिनती 25 गिनती 26 गिनती 27 गिनती 28 गिनती 29 गिनती 30 गिनती 31 गिनती 32 गिनती 33 गिनती 34 गिनती 35 गिनती 36Verse
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गिनती 23:26 - क्या मैंने तुझसे नहीं कहा कि जो कुछ यहोवा मुझसे कहेगा, वही मुझे करना पड़ेगा?
यह वचन किसी अदल-बदल की स्थिति में है कि परमेश्वर का कथन सर्वोपरि है और मनुष्य के विचारों की सीमाओं से बाहर है। बिलाम का यह उत्तर बालाक के साथ उनके संवाद का अंतरे है जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि दुष्ट योजना भी चाहे कितनी भी सुव्यवस्थित क्यों न हो, परमेश्वर की इच्छा से ऊपर नहीं उठ सकती। यह verse उस समय के धार्मिक-राजनीतिक तनाव को दर्शाता है जब परीक्षण के क्षणों में आदर्श और सत्ता की दुनिया टकराती है।
पृष्ठभूमि: asli परिप्रेक्ष्य
यह अध्याय मिस्र से निकलकर जंगल-यात्रा के दौरान बालाक ने होर के नाम से माईडन-राज्य में बिलाम को बुलवाया ताकि वह इस्राइलियों पर अभिशाप कर सके। परन्तु परमेश्वर ने बिलाम को मार्गदर्शन दिया कि जो कहना है वही कहना है, और अभिशाप नहीं वरन् आशीर्वाद निकल सकता है। इस verse में बिलाम की दृढ़ता की कसौटी आगे बढ़ती है कि उनका लिखित आशीष-प्रेरित संदेश परमेश्वर के निर्देशों से संचालित हुआ।
मुख्य संदेश
यह पंक्ति प्रेरित करती है कि सचमुच यहोवा का वरदान और हुक्म सर्वोपरि हैं; जो कुछ भी बिलाम से कहा गया है, उसे वह मानते हैं क्योंकि वह परमेश्वर के आदेशों के अधीन है। मनुष्यों की स्वार्थी योजनाओं के विपरीत, परमेश्वर का उद्देश्य अपरिवर्तनीय रहता है और वह अपने लोगों के लिए न्याय-निष्ठा से आगे बढ़ता है।
मुख्य विषय-वस्तु और बाइबल के सुरक्षा-कनिष्ठ
क्रॉस-रेफरेंसेज और संक्षिप्त संबंध
1) प्रेरित-वचन के अनुसार यह सिद्धांत कि परमेश्वर का हर संकेत ही निर्देशन का आधार है (उक्त संदर्भ के साथ): परमेश्वर के निर्देश के बाहर कुछ भी न चले।
2) इन परिशीलनों के साथ, हिश्त-यात्रा में आशीर्वाद की संभावना पर जोर मिलता है—यह बताता है कि परमेश्वर की योजना में विपरीत परिस्थितियाँ भी उनके उद्देश्य को सिद्ध करती हैं।
3) आदि-उद्धृत वचनात्मक विवेचनाओं के साथ, यह दिखता है कि धर्म-सत्य का मार्ग नैतिकता और धार्मिकता से भरा रहता है; सत्ता के दबाव में भी ईश्वर की संहिता से विचलन नहीं होता।
टिप्पणीकारों से संक्षेप विचार
मैथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बर्न्स और एडम क्लार्क के प्रकाशित विचारों के सारांश से यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर के हुक्म की एकरूपता विश्वस्त है—यह सच है कि आध्यात्मिक निर्णयों में आस्था का परीक्षण होता है, परन्तु परमेश्वर के आदेश के अनुरूप ही जीवन के कदम उठाने चाहिए। (इन व्याख्याओं के छोटे-छोटे साक्ष्यों के अभिवेचन के रूप में केवल संकेत-उद्धरण के रूप में कहा गया है; पूर्ण पाठ उद्धरण नहीं दिए गए हैं।)
व्यावहारिक उपयोग और व्यक्तिक Devotional विचार
ईमानदारी से पूछिए: मेरे सम्मुख किन-किन फैसलों पर दुष्ट दबाव आ सकता है? क्या मैं परमेश्वर के निर्देश को पहले समझकर, उसी के अनुसार कदम उठाने को तैयार हूँ? भरोसा रखें कि परमेश्वर के आदेश वही हैं जो जीवन को सही दिशा देते हैं।
संक्षिप्त उद्धरण चेतावनी
यदि आप चाहें तो मैथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बर्न्स या एडम क्लार्क के सीधे उद्धरणों के पते/संयोजन के लिए आगे बढ़ सकता हूँ, परन्तु अभी के पाठ में किसी पूर्ण वाक्य का उद्धरण नहीं दिया गया है।
समापन: इस verse में दर्शाया गया है कि परमेश्वर की योजना अडिग है और उसके प्रचार-आदेश के भीतर ही यहोवा अपने लोगों को मार्गदर्शित करता है—यही हमारी आध्यात्मिक सुरक्षा है।