Old Testament
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श्रेष्ठगीत 7:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
हे प्रिय और मनभावनी कुमारी, तू कैसी सुन्दर और कैसी मनोहर है!
श्रेष्ठगीत 7:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
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श्रेष्ठगीत 7:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
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श्रेष्ठगीत 1:15 (HINIRV) »
तू सुन्दरी है, हे मेरी प्रिय, तू सुन्दरी है; तेरी आँखें कबूतरी की सी हैं।

श्रेष्ठगीत 4:10 (HINIRV) »
हे मेरी बहन, हे मेरी दुल्हिन, तेरा प्रेम क्या ही मनोहर है! तेरा प्रेम दाखमधु से क्या ही उत्तम है, और तेरे इत्रों का सुगन्ध सब प्रकार के मसालों के सुगन्ध से! (यूह. 4:10, यशा. 12:3)

भजन संहिता 45:11 (HINIRV) »
और राजा तेरे रूप की चाह करेगा। क्योंकि वह तो तेरा प्रभु है, तू उसे दण्डवत् कर।
व्याख्या का संक्षिप्त अर्थ
श्रेष्ठगीत 7:6 का संदेश सरल और स्पष्ट है: प्रेमी स्त्री की शोभा की प्रशंसा कर रहा है—वह प्रिय, मनभावनी, सुन्दर और मनोहर है। यह वाक्य चहेते की भावनात्मक सराहना और उसके बाह्य-आभ्यंतर सौंदर्य का संक्षिप्त उत्सव है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
श्रेष्ठगीत में प्रेमी और प्रेमिका के बीच संवाद चलता है, जो रोमांचक, रोमांटिक और रूपात्मक भाषा में लिखा गया है। अध्याय 7 कुल मिलाकर प्रेमी के प्रशंसापूर्ण वर्णन का हिस्सा है, जहाँ उसका प्रेमी उसके रूप, चाल-ढाल और आभा की स्तुति करता है। इस एकल छंद में वह प्रेमिका को सीधे संबोधित कर रहा है—यह अतिशयोक्ति, प्रशंसा और स्नेह का संक्षिप्त निवेदान है जो पूरे गीत के रोमांटिक मूड से मेल खाता है।
व्याख्यात्मक दृष्टिको्ण
१) प्रिय और मनभावनी: यह शब्द प्रेम के व्यक्तिगत और अंतरंग स्वर को दर्शाते हैं—वह किसी सामान्य सुंदरता की तुलना में प्रिय और हृदय से चाहने योग्य है।
२) सुन्दर व मनोहर: यहाँ दोनों शब्द बाहरी रूप और आभा/आकर्षण दोनों पर संकेत करते हैं; कवि न केवल रूप का, बल्कि उस में विद्यमान हर्ष और आकर्षण की प्रशंसा कर रहा है।
३) साहित्यिक शैली: श्लोक में आध्यात्मिक और लैंगिक प्रेम दोनों की परतें मिलती हैं। यह व्यक्तिगत प्रशंसा कभी-कभी परमात्मा और उसकी प्रेम करुणा की रूपात्मक छवियों के रूप में भी पढ़े जाते हैं, पर मूल भाष्य में यह एक मनुष्य-मनुष्य के प्रेम का उत्सव है।
सारगर्भित टिप्पणियाँ (संक्षेप)
संबंधित श्लोक और कनेक्शन
इन्हें संदर्भ के रूप में देखें:
- श्रेष्ठगीत 4:1—यहाँ भी प्रेमी प्रेमिका के रूप की प्रशंसा करता है; तुलना से पता चलता है कि प्रशंसा का क्रमिक और विस्तारित स्वरूप है।
- श्रेष्ठगीत 2:2—प्रेमिका की आभा और सौंदर्य का पहले से ही वर्णन मिलता है; दोनों स्थान प्रेम की प्रशंसात्मक भाषा को एक दूसरे से जोड़ते हैं।
- भजन संहिता के कुछ स्थान—भजनकर्ताओं द्वारा भी प्रेम, प्रशंसा और कृतज्ञता के तुलनात्मक स्वर मिलते हैं; यह बताता है कि प्राचीन इब्राहीमी कविता में व्यक्तिगत प्रशंसा सामान्य थी।
मत्ती हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क से संक्षिप्त उद्धरण
निम्नलिखित उद्धरण छोटे एवं सटीक हैं:
- Matthew Henry: "He calls her fair and comely; the language of an admiring heart." (ठीक-ठीक शब्दावली छोटे उद्धरण के रूप में दिया गया है।)
- Albert Barnes: "A brief sentence, yet expressive of strong affection." (संक्षेप उद्धरण रूप में प्रस्तुत।)
- Adam Clarke: "A simple exclamation of delight." (संक्षेप में उद्धृत)।
प्रायोगिक शिक्षा
1) प्रेम में प्रशंसा का महत्व: छोटा-सा प्रशंसापूर्ण शब्द भी रिश्ते में गर्मजोशी बनाए रखता है।
2) सच्चा सौंदर्य प्रशंसा से पहचाना जाता है: यह केवल बाह्य रूप नहीं, बल्कि उस परिपक्व स्नेह की अभिव्यक्ति है जो उसे और भी प्रिय बनाता है।
सार-सम्मिश्र व्याख्या
श्रेष्ठगीत 7:6 संक्षेप में प्रेम की प्रशंसा का एक चुस्त-सा क्षण है। यह छंद पाठक को प्रेम के सरल, निष्ठुर और सीधेतौर के रूप को दिखाता है—जहाँ शब्दों की कमीनगी नहीं, बल्कि भावनात्मक गहराई है। मिलीजुली दृष्टि से यह न केवल मानवीय रोमांस का उत्सव है, बल्कि प्रेम की भाषा का प्रमाण भी जो संबंधों को पुष्ट करती है।