Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
1 यूहन्ना 4:1 1 यूहन्ना 4:2 1 यूहन्ना 4:3 1 यूहन्ना 4:4 1 यूहन्ना 4:5 1 यूहन्ना 4:6 1 यूहन्ना 4:7 1 यूहन्ना 4:8 1 यूहन्ना 4:9 1 यूहन्ना 4:10 1 यूहन्ना 4:11 1 यूहन्ना 4:12 1 यूहन्ना 4:13 1 यूहन्ना 4:14 1 यूहन्ना 4:15 1 यूहन्ना 4:16 1 यूहन्ना 4:17 1 यूहन्ना 4:18 1 यूहन्ना 4:19 1 यूहन्ना 4:20 1 यूहन्ना 4:21



1 यूहन्ना 4:10 (HINIRV): प्रेम इसमें नहीं कि हमने परमेश्वर से प्रेम किया…
यह आयत बताती है कि परमेश्वर के प्रेम की वास्तविकता स्वयं हमारे कर्मों से नहीं, बल्कि उसकी क्रिया से शुरू होती है: उसने ही पहले हम से प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चर्य के लिए अपने पुत्र को भेजा। इसे इस पूरे प्रबोधन के समुच्चय में देखें कि प्रेम के साक्ष्य के लिए हमारे कर्म आवश्यक नहीं, बल्कि परमेश्वर की उदारता और कृपा आवश्यक है। नित नए नियम के भीतर यह प्रेम-प्रत्यय हमें अपने संबंध को पुनः पुनर्स्थापित करने का बुलावा देता है—कि हम परमेश्वर की ओर मुड़कर और दूसरों के साथ उसी प्रेम को व्यवहार में लाएं।
मुख्य अर्थ
युहन्ना लेखक अपनी आत्मीयता के साथ कहते हैं कि प्रेम का मूल स्रोत परमेश्वर है। मसीह के पवित्र बलिदान द्वारा हमारे पापों का प्रायश्चित होना यह प्रमाण है कि परमेश्वर ने पहले हमसे प्रेम किया है। हमारे द्वारा परमेश्वर से प्रेम करना तब संभव होता है जब वह हमें अपने प्रेम से नव जन्म देता है; यह प्रेम हमारे भीतर कोमलता, क्षमा और विश्वसनीयता लाता है।
मुख्य विषय
कुंजी उपस्थितियाँ (Themes)
1) दिव्य प्रेम की प्रेरणा: यह नहीं है कि हमने पहले परमेश्वर से प्रेम किया, बल्कि उसने हम से प्रेम किया।
2) बलिदान की मूरत: अपने पुत्र को भेजना दर्शाता है कि परमेश्वर की सच्ची इच्छा हमारे पापों के लिए कीमत चुकाने की है।
3) आस्था और परिवर्तन: प्रेम प्रकृति में आना, और हमारे व्यवहार में नैतिक परिवर्तन को प्रेरित करना चाहिए।
सम्बन्धित पाठ ( Cross-references )
आत्म-साक्षी प्रमाण के लिए देखें:
इन संदर्भों में यह दिखता है कि प्रेम के क्रिया-रूप कैसे বিশ্বাস को पुष्ट करता है और जीवन के व्यवहार में इसे स्पष्ट करता है।
व्यावहारिक विचार
दैनिक जीवन में इसे कैसे लागू करें? उन लोगों के प्रति धैर्य और क्षमा दिखाएं जिनसे दूरी बन चुकी है; प्रायः सहायता की छोटी-सी चेष्टा—खाने-पीने में उधार देना, असहाय के लिए समय निकालना—ये सब इस प्रेम के वास्तविक विन्यास हैं। एक संतुष्ट आत्मा वही है जो प्रेम के इस divine प्रेरणा के साथ जीती है।
संक्षिप्त समापन
इस आयत का सार यह है: प्रेम का उद्घाटन परमेश्वर से है, जिसने पहले हमें प्रेम किया और अपने पुत्र के बलिदान के माध्यम से हमारे पापों का प्रायश्चित्त किया। इस प्रेम के परिणामस्वरूप हमारा जीवन दूसरों के लिए प्रेमपूर्ण और धारदार बनना चाहिए—यही विश्वासी का वास्तविक प्रकटन है।