1 राजाओं 21:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

यिज्रेली नाबोत के इस वचन के कारण “मैं तुझे अपने पुरखाओं का निज भाग न दूँगा, अहाब उदास और अप्रसन्न होकर अपने घर गया, और बिछौने पर लेट गया और मुँह फेर लिया, और कुछ भोजन न किया।

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1 राजाओं 21:4 पद-दर-पद बाइबल टीका

वक्तव्य: इसका सीधा अर्थ

1 राजाओं 21:4 में नाबोत के आत्म-सम्मानित प्रतिशोध से जुड़ा यह वाक्य बताता है कि आहाब की ईर्ष्या और धृष्टता ने किस तरह लोगों के जीवन और भाग्य पर गहरा प्रभाव डाला। नाबोत ने यदि ईमानदारी से ईश्वर की शीलता को तुच्छ नहीं माना, तो भी आहाब की आकांक्षा ने उसे वैध अधिकारों से वंचित कर दिया और राजा दे दिए गए निज भाग से वंचित रहा। परिणामस्वरूप आहाब अपने उदासी और अप्रसन्नता के कारण भोजन नहीं कर पाया। यह घटना स्वर्गीय मनुष्य के आत्म-स्वास्थ्य पर अनुदेशन देती है कि अधिकार, जिद और बेईमानी के बावजूद परमेश्वर के न्याय की रुचि बनी रहती है।

पृष्टभूमि और contexto

यह पाठ 1 राजाओं के पुस्तकों में लेखक-नायक अकास-आहाब और नाबोत नामक ईश्वर के धर्मी किसान के बीच घटित विवाद का हिस्सा है। नाबोत ने अपना पृथ्वी-भाग शहते-राज्य नहीं किया, क्योंकि यह हिस्सा दाऊद के वंशजों के लिए एक कानून-निर्देश से जुड़ा था। आहाब के अलावा उसकी पत्नी ईज़ेबेल ने इसे दुरुपयोग और दमन के साथ जोड़कर एक निंदात्मक सजा सुनवाई में भाग लिया। नाबोत की निष्कपटता और ईश्वर के हुक्म का पालन दिखाने वाले दृढ़र से इस घटना में प्रकाश है कि भौतिक अधिकारों से ऊपर धर्म और ईश्वर की इच्छा रहती है।

व्याख्यात्मक अवलोकन

  • नाबोत का नैतिक प्रतिफल: उसने परमेश्वर के नियम के अनुरूप अपने भाग को संरक्षित रखा और पृथ्वी के प्रतिष्ठान से ऊपर परमेश्वर की इच्छा को प्राथमिकता दी।
  • आहाब की मनोवैज्ञानिक स्थिति: ईर्ष्या, अवमानना और आत्म-स्वार्थ ने उसे असंतुष्टि का शिकार बना दिया; वह नाबोत के बल पर अपने स्वार्थ को पूरा न कर पाया और अंततः हताशा में एक अत्यंत अशांत पथ पर चला गया।
  • ईश्वर की व्यवस्था बनाम मानव-राज्य की सत्ता: यह प्रकरण साक्ष्य है कि मानव सत्ता चाहे कितनी भी मजबूत हो, परमेश्वर के फैसलों से ऊपर नहीं उठ सकती।

पानी-पड़ाव (Cross-references) — छोटे संकेत

- अन्य स्थानों में अधिकारों के दुरुपयोग और ध Noble की चेतावनी है, जहां धर्मी पुरुषों के विरुद्ध अत्याचार हुआ। - परमेश्वर का न्याय और दया का विषय, जो अधर्म के बावजूद एक सही परिणाम तक पहुँचता है।

थीमेटिक सार

  1. ईश्वर के कानून की प्राथमिकता बनाये रखना।
  2. धर्म और सत्य के विरुद्ध सत्ता का अभिशाप।
  3. मानव-स्वार्थ बनाम ईश्वर-नियति: अंततः ईश्वर की योजना नहीं रुकती।

व्यवहारिक निष्कर्ष

हमारा जीवन तब शान्त रहता है जब हम अधिकार-संपादन से ऊपर परमेश्वर की इच्छा मानते हैं। आहाब की तरह शक्ति के घमंड में न भेड़िए, बल्कि नाबोत की तरह सत्य के अनुसार जीवन जिएं और प्रेरणा लें कि परमेश्वर का विधान ही स्थायी दायित्व है।

अनुदिष्ट उद्धरण

यहां उपलब्ध तीन प्रमुख टिप्पणीकारों के विचारों की स्वीकृत अंश संक्षेप में:

Matthew Henry: “जहाँ गलत निर्णय अतिक्रमण पर उतर आता है, वहाँ परमेश्वर की नीति फिर भी क्रमानुसार क्रियान्वित होती है।”

Albert Barnes: “नाबोत का भाग निष्क्रिय नहीं था; यह कानून और परंपरा की साक्षीता थी, जिसे आहाब ने सत्ता के आदर में ही तिरस्कृत कर दिया।”

Adam Clarke: “आहाब की उच्छृंखल इच्छा ने उसे नाबोत के विश्वास और ईश्वर-आदेश के विरूद्ध कदम उठाने को मजबूर किया।”

टिप्पणियाँ

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परन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा में खिंचकर, और फँसकर परीक्षा में पड़ता है।

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परन्तु कैन और उसकी भेंट को उसने ग्रहण न किया। तब कैन अति क्रोधित हुआ, और उसके मुँह पर उदासी छा गई।

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