2 इतिहास 29:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

देखो हमारे पुरखाओं ने विश्वासघात करके वह कर्म किया था, जो हमारे परमेश्‍वर यहोवा की दृष्टि में बुरा है और उसको तज करके यहोवा के निवास से मुँह फेरकर उसको पीठ दिखाई थी।

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2 इतिहास 29:6 पद-दर-पद बाइबल टीका

2 इतिहास 29:6 का सरल अर्थ

इस आयत में कहा गया है कि हमारे पूर्वजो ने विश्वासघात किया और परमेश्वर यहोवा की दृष्टि में बुरा किया, वह कर्म किया जो उसने नापसंद किया। इसलिए वे यहोवा के निवास से मुँह फेरकर उसको पीठ दिखाने लगे।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

यहोशू के बाद यहूदा और यरूशलेम में राजा आकर राज्य-यज्ञों और पूजाओं में गिरावट का दौर चला। इतिहास में नबियों के संदेश और विधिनिष्ठी धार्मिक रीति-रिवाजों के उल्लंघन का बड़ा असंतोष दिखता है। यह आयत उस समय की चेतावनी है जब लोग परमेश्वर के आदेशों को मानना छोड़कर अपने तरीके से जीवन जीते हैं।

व्याख्यात्मक निरीक्षण

- विश्वासघात का अर्थ है परमेश्वर के प्रति विश्वसनीयता का उल्लंघन और उससे दूरी बनाना। यह शब्द अक्सर पापपूर्ण निर्णयों की निरन्तरता को दर्शाता है।

- “दृष्टि में बुरा” यह दर्शाता है कि परमेश्वर हर समय हमारे कर्मों को देखता है और उसके तरीके से विचलन उसे अपमानित लगता है।

- “निवास से मुँह फेरकर पीठ दिखाना” यह एक गहन अस्थायी और स्थायी रुख का चित्रण है, जिसमें आत्मिक संबंध टूटता है और देह-धर्म से दूरी बनी रहती है।

कथनात्मक निष्कर्ष

  • परमेश्वर के नियमों से चूके बिना नहीं चलना चाहिए; दूरियाँ तब बढ़ती जाती हैं जब स्मरण और नीति भूल जाते हैं।
  • पृथ्वीवरीय आराम और परंपराओं के पीछे नहीं, परमेश्वर के निष्ठावान निर्देशों के अनुरेखण में जीवन जीना चाहिए।

क्रॉस-रेफरेंसेस

- संदर्भ: विकल्प-आयतों में से एक—ऐसी घटनाओं के कारण यहोवा का क्रोध और फिर रोशनी के क्षण आना संभव होता है; यह चेतावनी हमें स्मरण कराती है कि पवित्रता और आध्यात्मिक क्रियाएं क्रमशः पुनःस्थापना के मार्ग खोल सकती हैं।

- क्रॉस-रेफरेंस 1: पुराने नियम के अन्य उदाहरण जहाँ लोग परमेश्वर से विचलित होते हैं और परिणामस्वरूप दण्ड भुगतते हैं; इससे स्पष्ट है कि बाइबल मरियम-लंबे समय तक पालन और परिश्रम को महत्व देती है।

- क्रॉस-रेफरेंस 2: मसीह के अनुयायी के लिए पवित्रता बनाए रखने के लिए प्रेरणा देती है कि दैनंदिन जीवन में निष्ठा कितनी आवश्यक है।

सार-सारांश

यह आयत स्मरण कराती है कि परमेश्वर के निवास के साथ सन्निकट रहने के लिए विश्वास और आज्ञाओं का पालन अत्यंत आवश्यक है। जब लोग अपने तरीके अपनाते हैं और परमेश्वर से दूरी बनाते हैं, तो दण्ड और आलोचना भी आ सकता है। परन्तु विपत्तियों के बीच भी पवित्रता बनाये रखने से पुनः निष्ठा लौट सकती है, और परमेश्वर का चेहरा फिर दिखाई दे सकता है।

व्यावहारिक takeaway

आज के जीवन में यह सीख दें कि जो कुछ भी हम करें, वह परमेश्वर की दृष्टि में मिलना चाहिए। निष्ठा, विनम्रता, और परमेश्वर के सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने से हर परिस्थिती में तसल्ली और आंतरिक शांति मिलती है।

इतिहासिक टिप्पणी (उद्धरण सहित)

यहाँ प्रसिद्ध सार्वजनिक-डायन टिप्पणीकारों के सामान्य निष्कर्ष मिलता है—क्योंकि यहूदा के इतिहास में आत्मा-आडंबर बनाम भक्ति के बीच टकराव रहा है।
- मैथ्यू हेनरी के अनुसार: "…" (विशेष टिप्पणी स्थित पाठ में उद्धृत नहीं हो तो संक्षेपित विचार प्रस्तुत);
- अल्बर्ट बॉर्न्स के अनुसार: "…" (सार तात्पर्य यह कि भक्ति में धैर्य और दृढ़ता बनी रहे);
- एडम क्लार्क के अनुसार: "…" (आयत के नैतिक संदेश का संक्षेप)

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

2 इतिहास 29:6 समानांतर पद और संबंधित वचन

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और कहते हो, ‘यदि हम अपने पूर्वजों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्ताओं की हत्या में उनके सहभागी न होते।’

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