Old Testament
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2 कुरिन्थियों 10:1 2 कुरिन्थियों 10:2 2 कुरिन्थियों 10:3 2 कुरिन्थियों 10:4 2 कुरिन्थियों 10:5 2 कुरिन्थियों 10:6 2 कुरिन्थियों 10:7 2 कुरिन्थियों 10:8 2 कुरिन्थियों 10:9 2 कुरिन्थियों 10:10 2 कुरिन्थियों 10:11 2 कुरिन्थियों 10:12 2 कुरिन्थियों 10:13 2 कुरिन्थियों 10:14 2 कुरिन्थियों 10:15 2 कुरिन्थियों 10:16 2 कुरिन्थियों 10:17 2 कुरिन्थियों 10:18



मुख्य अर्थ: प्रभु के द्वारा ही की गई बड़ाई है वास्तविक मान्यता
2 कुरिन्थियों 10:18 कहता है कि जो अपनी बड़ाई करता है, वह नहीं ग्रहण किया जाता; जो बड़ाई प्रभु में हो, वही मान्यता पाता है। सरल शब्दों में:orthyूक्ति मैं यह कहा गया है कि ईमानदार सेवक वही समर्थ माने जाते हैं जहाँ लोग real मानते हैं कि उनकी सफलता और गुण परमेश्वर के उद्धारकार्य में है, न कि उनकी अपनी योग्यता में।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
पौलुस ने कुरिन्थों से बातें इसलिए कीं ताकि वे उसकी शब्दावली के बजाय परमेश्वर के उद्धार के स्रोत पर ध्यान दें। यहाँ “बड़ी-गुण” (self-commendation) का विरोध है, जो लोग अपनी सफलताओं को अपनी योग्यता से मानते हैं, वे वास्तविक वजन नहीं पाते। प्रेरित पौलुस प्यारी प्रेरिताई में अपनी कमजोरियों को भी ईश्वर की कृपा से जोड़े देखते हैं, ताकि लोग ईश्वर की महिमा को ही समझें।
व्याख्यात्मक अवलोकन
संক্ষिप्त विषयगत सूची
संदर्भित पार्श्व पाठ
यूहन्ना 15:5— आत्म-निर्भरता को छोड़कर शाखा की तरह दृढ़ रहने पर ही जीवन मिलता है; बिना माफ़ी नहीं, केवल प्रभु के साथ सहजीवन।
फिलिप्पियों 2:3-4— स्वार्थी अहंकार की जगह विनय और दूसरों की मदद को महत्व दें; दूसरों की उन्नति अपनी उन्नति से ऊपर करें।
रोमियों 12:3— एक संतुलित दृष्टिकोण रखें; अपनी आयाम-सीमताओं को ईश्वर के अनुग्रह की जोड़-तोड़ में मापा जाए।
पौन्ट-आउट और उद्धरणात्मक पंक्ति
यह स्पष्ट संदेश है कि “जो अपनी बड़ाई करता है, वह ग्रहण नहीं किया जाता,” और “जो बड़ाई प्रभु करता है, वही ग्रहण किया जाता है।”
व्यावहारिक निष्कर्ष
आज के जीवन में सोच-समझकर अपनी उपलब्धियों के कारणों को फिर से जांचें: क्या मैं परमेश्वर की कृपा और बल पर निर्भर हूँ, या मैं अपनी सफलता को अपनी योग्यता से जोड़ रहा हूँ? उन जगहों की पहचान करें जहाँ अहंकार ऊँचा उठ सकता है, और वहाँ विनय को अपनाने का प्रयास करें।
निष्कर्ष: एक परमेश्वर-केन्द्रित जीवन
इस पद पर विचार करते हुए हमारे लिए सीख यह है कि ईश्वर की महिमा के लिए जीना ही वास्तविक सफलता है। अगर हम प्रभु पर विश्वास बनाए रखें, तो हमारी जीत और योग्यताएं ईश्वर के नाम की महिमा में परिवर्तित होती हैं, न कि हमारे स्व-गौरव के माध्यम से।
नोट: नीचे दिये गये प्रसिद्ध प्रकाशनों से संक्षिप्त विचार इस पाठ के साथ जोड़ते हैं, ताकि पाठक को संदर्भित विचार मिल सके।
मत्ती हेनरी ( Matthew Henry ) के प्रमाणित टेक्स्ट से: “...”
एल्बर्ट बार्न्स ( Albert Barnes ) के प्रमाणित टेक्स्ट से: “...”
एडम क्लार्क ( Adam Clarke ) के प्रमाणित टेक्स्ट से: “...”