Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
2 कुरिन्थियों 4:1 2 कुरिन्थियों 4:2 2 कुरिन्थियों 4:3 2 कुरिन्थियों 4:4 2 कुरिन्थियों 4:5 2 कुरिन्थियों 4:6 2 कुरिन्थियों 4:7 2 कुरिन्थियों 4:8 2 कुरिन्थियों 4:9 2 कुरिन्थियों 4:10 2 कुरिन्थियों 4:11 2 कुरिन्थियों 4:12 2 कुरिन्थियों 4:13 2 कुरिन्थियों 4:14 2 कुरिन्थियों 4:15 2 कुरिन्थियों 4:16 2 कुरिन्थियों 4:17 2 कुरिन्थियों 4:18



2 कोरिंथियों 4:5 का पाठ-व्याख्या (HINIRV)
यह पद मित्रों के सामने मंगल-प्रचार के दायित्व को रेखांकित करता है। पवित्र लेखक कहना चाहता है कि हमारा उद्धेश्य खुद पर नहीं, बल्कि मसीह यीशु पर है; वह प्रभु है और उसी के कारण हम तुम्हारे सेवक बनकर उसका संदेश पहुँचाते हैं। इस संदेश में शक्ति परमेश्वर की है, हम नहीं।
पाठ का दर्जा और संदर्भ
यह पंक्ति कुँदो-सी पंक्तियों के बीच एक विशिष्ट निष्कर्ष प्रस्तुत करती है: प्रचार का केन्द्र मसीह है, न प्रचारक की प्रभावोत्पत्ति या उसके सम्मान का प्रदर्शन। यदि हम आगे-पीछे देखें, तो 4 अध्याय के पूरे खंड में प्रेरित पौलुस परीक्षणों, कठिनाइयों और परमेश्वर की कृपा के गहरे अनुभवों के माध्यम से संतति पर जोर देते हैं—कि प्रभु के संदेश का उद्धारक प्रभाव उनके शब्दों और जीवन से प्रकट हो।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
प्रमुख आयाम—अनुसंगत अन्य पदों से तुलना
1) और 5:20 में हम दिखाते हैं कि क्रूस पर मरकर जी उठे मसीह के संदेश का दायित्व है, जो संसार को विश्वास के रास्ते दिखाता है।
2) 3:5-6 में कहा गया है कि हमारा साधन-स्तरय नहीं, परन्तु परमेश्वर की कृपा से नेतृत्व और रंग-रूप मिलता है ताकि आत्मा के काम से नई सृजन हो सके।
3) याकूब 1:27 जैसी प्रेरणा भी बताती है कि प्रचार मात्र वचन नहीं, जीवन-पत्र भी होना चाहिए—यानी हमारे व्यवहार में वही प्रकाशित हो जो हम कहें।
वास्तविक जीवन-लाभ और व्यावहारिक अनुप्रयोग
- प्रचारक के रूप में हमारा पहला उद्देश्य खुद की महिमा नहीं, मसीह की महिमा है। अपने शब्दों और कार्यों को ऐसे रखें कि लोग सच्ची प्रभुता और चरणों में गिरने वाले प्रेम को देखें।
- कठिन समय में भी प्रभु के बारे में आशा बनाये रखें; क्योंकि हमारी सलाह और प्रेरणा प्रभु से आती है, न हमारे निजी क्षमताओं से।
- विश्वासियों से संबंध में नम्रता और सेवा का भाव रखें। मसीह की सेवा में अपने अधिकारों को न माने, बल्कि एक सेवक के रूप में समर्पित रहें।
क्रॉस-रेफरेन्स और उनसे जोड़ने का संक्षेप
- 4:1-2: नैतिक और ईमानदार प्रचार—प्रतिफल-भरोसे के साथ अक्षर में नहीं, बल्कि स्पष्ट सत्य पर आधारित।
- 3:17-18: आत्मा का उद्धारक परिवर्तन; जब परमेश्वर की इच्छा से क्रोध नहीं, बल्कि विश्वास का परिवर्तन आता है।
- 5:20: हमें मसीह के प्रतिनिधि के रूप में देखकर संसार से अलग एक संदेशवाहक बनाता है—यही इस अध्याय का केंद्रीय विचार।
संक्षेप-निष्कर्ष
यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि ख्याति, प्रभाव या व्यक्तिगत सहभागिता से बढ़कर हमारा मिशन है: मसीह यीशु को प्रचारित करना। हमारी कमजोरी में भी परमेश्वर की शक्ति प्रकट होती है, ताकि विश्वासियों के जीवन में नया प्रकाश और बदलाव आये।
दलन-उद्धरण (परोक्त विचार सार्वजनिक-डायरे के समान अनुभवी टिप्पणीकारों से प्रेरित):
मूर्त विचारधारा के लिए मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के उद्धरण आवश्यक संदर्भ में छोटे-छोटे एकदम संक्षिप्त शब्दों में मिलते हैं—इनमें से कोई एक भी पूर्ण वाक्य उद्धृत नहीं किया गया है; परन्तु उनके सामान्य सार में यह मान्य है कि प्रचार का केन्द्र मसीह है, और सेवकत्व में प्रभु का अधिकार सर्वोपरि है।