Old Testament
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2 थिस्सलुनीकियों 1:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
यह परमेश्वर के सच्चे न्याय का स्पष्ट प्रमाण है; कि तुम परमेश्वर के राज्य के योग्य ठहरो, जिसके लिये तुम दुःख भी उठाते हो*।
2 थिस्सलुनीकियों 1:5 पद-दर-पद बाइबल टीका
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2 थिस्सलुनीकियों 1:5 समानांतर पद और संबंधित वचन
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फिलिप्पियों 1:28 (HINIRV) »
और किसी बात में विरोधियों से भय नहीं खाते। यह उनके लिये विनाश का स्पष्ट चिन्ह है, परन्तु तुम्हारे लिये उद्धार का, और यह परमेश्वर की ओर से है।

प्रेरितों के काम 14:22 (HINIRV) »
और चेलों के मन को स्थिर करते रहे और यह उपदेश देते थे कि विश्वास में बने रहो; और यह कहते थे, “हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा।”

प्रकाशितवाक्य 19:2 (HINIRV) »
क्योंकि उसके निर्णय सच्चे और ठीक हैं, इसलिए कि उसने उस बड़ी वेश्या का जो अपने व्यभिचार से पृथ्वी को भ्रष्ट करती थी, न्याय किया, और उससे अपने दासों के लहू का पलटा लिया है।” (व्य. 32:43)
2 थिस्सलुनीकियों 1:5 — संदर्भ और स्थापना
पद नीचे के संदर्भ में लिखा गया है कि किस प्रकार परमेश्वर की न्यायपूर्ण व्यवस्था स्पष्ट रूप से सामने आती है। इस अध्याय में प्रेरित पतरस के भक्तजन यहूदी-ख्रिस्तानी समुदाय को धैर्य और विश्वास के साथ कठिनाईयों में खड़े रहने की प्रेरणा दे रहा है; विशेषकर इस बात की पुष्टि कि वे दुष्टों के व्यवहार के बावजूद परमेश्वर के राज्य की शोभा के अनुरूप जीवन जी रहे हैं। यह पद उन दुखों के बीच परमेश्वर के राज्य के लिये योग्यता की बात करता है, जो उनके लिए उद्धार और सम्मान के स्रोत बनती है।
मुख्य अर्थ
यह वाक्य कहता है कि त्रुटिहीन न्याय का प्रमाण उनके जीवन में दिख रहा है—दिल से दर्द उठाने, कठिनाइयों को सहने, और विश्वास में दृढ़ रहने के कारण। परमेश्वर के राज्य में प्रवेश पाने के लिए यह संघर्ष-शक्ति आवश्यक है; उन लोगों के लिये जो cloud of trial से गुजरते हैं, यह स्पष्ट संकेत है कि उनका अनुभव न केवल पीड़ा है, बल्कि परमेश्वर की नीति के अनुरूप है और वे राज्य के योग्य ठहरते हैं।
कुंजी विषय
संबंधित पवित्रग्रंथ
- मत्ती 5:10-12: संतोष और प्रताप में आशीर्वाद का संदर्भ — क्या यह दुःख भी परमेश्वर के राज्य के लिये सम्मान बन सकता है? टिप्पणी में यह समझना चाहिए कि शास्त्र में आस्था की परीक्षा कैसे राज्य की स्थिति में मदद करती है।
- रोमियों 8:17-18: पीड़ा और प्रतिष्ठा के बीच संबंध; यह बताता है कि हम वास्तविक जीवन में भविष्य की महिमा का अनुभव करते हैं।
- याकूब 1:2-4: प्रकार-परख में प्रसन्न रहने की सीख—धैर्य पूर्णता को प्राप्त करता है।
व्यावहारिक विचार
- कठिन समय में भी अपनी आशा को केंद्रित रखें कि यह अवस्था परमेश्वर की न्यायपूर्ण योजना का हिस्सा है।
- कठोर परिस्थितियों में भी आपसी प्रेम और सहायता से समुदाय का सहारा बनें; साझा दुःख से विश्वास और मजबूत होता है।
कथन-सार
यह पद यह स्पष्ट करता है कि जो दयालु-विश्वासी कठिनाइयों में डटे रहते हैं, वे परमेश्वर के राज्य के लिये योग्य ठहरते हैं। उनका दुख एक भीतरी परीक्षा नहीं है, बल्कि परमेश्वर की न्यायपूर्ण व्यवस्था की साक्षी है, जिसका परिणाम अंशतः वर्तमान में अनुभव होता है और भविष्य की महिमा के लिए पथ प्रशस्त करता है।
क्रॉस-रेफरेंसेस
यद्यपि पूर्ण आयतोंकी पुनरुक्ति नहीं दी गई, नीचे तीन संदर्भ उनकी भूमिका समझाने में सहायक हैं:
संक्षिप्त निष्कर्ष
2 थिस्सलुनीकियों 1:5 में दुख-भरे जीवन का यह स्पष्ट प्रमाण है कि परमेश्वर का राज्य प्राप्ति के लिये धैर्य, विश्वास और पवित्र जीवन की आवश्यकता है। यह कठिनाइयाँ हमें जय की ओर न केवल प्रेरित करती हैं, बल्कि हमें न्याय-पूर्ण राज्य के योग्यता के दृढ़ प्रमाण भी दिखाती हैं।
(याद रहे: इस पाठ के लिये Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से सीधे वाक्य-उद्धरण केवल आवश्यक ठहरने पर ही उद्धृत करें; यहाँ samman की नीति के अनुसार प्रत्यक्ष उद्धरण नहीं जोड़े गए हैं।)