Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
प्रेरितों के काम 1 प्रेरितों के काम 2 प्रेरितों के काम 3 प्रेरितों के काम 4 प्रेरितों के काम 5 प्रेरितों के काम 6 प्रेरितों के काम 7 प्रेरितों के काम 8 प्रेरितों के काम 9 प्रेरितों के काम 10 प्रेरितों के काम 11 प्रेरितों के काम 12 प्रेरितों के काम 13 प्रेरितों के काम 14 प्रेरितों के काम 15 प्रेरितों के काम 16 प्रेरितों के काम 17 प्रेरितों के काम 18 प्रेरितों के काम 19 प्रेरितों के काम 20 प्रेरितों के काम 21 प्रेरितों के काम 22 प्रेरितों के काम 23 प्रेरितों के काम 24 प्रेरितों के काम 25 प्रेरितों के काम 26 प्रेरितों के काम 27 प्रेरितों के काम 28Verse
प्रेरितों के काम 6:1 प्रेरितों के काम 6:2 प्रेरितों के काम 6:3 प्रेरितों के काम 6:4 प्रेरितों के काम 6:5 प्रेरितों के काम 6:6 प्रेरितों के काम 6:7 प्रेरितों के काम 6:8 प्रेरितों के काम 6:9 प्रेरितों के काम 6:10 प्रेरितों के काम 6:11 प्रेरितों के काम 6:12 प्रेरितों के काम 6:13 प्रेरितों के काम 6:14 प्रेरितों के काम 6:15



प्रेरितों के काम 6:14 पर टिप्पणी (HINIRV)
यह पाठ प्रेरितों के एक संदर्भ से जुड़ा है जब धर्मशास्त्री व्यवस्था-पर उतार-चढ़ाव और पवित्रता की मांगों को नया मानते हैं। नीचे दिए गए संदर्भ से स्पष्ट होता है कि कैसे कुछ धार्मिक नेताओं ने यीशु मसीह के बारे में गलत धारणा बना ली थी और कैसे वे पवित्र कार्यों और परंपराओं के ढांचे को अपने मत के अनुसार नियंत्रित करना चाहते थे।
अनुवादित पाठ और संदर्भ
यह पंक्ति प्रेरितों के कार्यों में उन विचारों का सार है जो धार्मिक नेताओं ने यीशु के बारे में व्यक्त किए—कि यीशु नासरी जगह-ढाह कर नए नियम की रीतियाँ लाएंगे और मूसा द्वारा सौंपी गई व्यवस्था में बदलाव करेंगे। यह कथन उस समय के तनाव को दर्शाता है जब नवीन विश्वास और पुरानी व्यवस्था के बीच तनाव बढ़ रहा था।
मुख्य अर्थ
यह वाक्यावलय बहस का संकेत देता है कि कुछ लोग यीशु के काम को नई परंपराओं के रूप में देखते हैं—जैसे उनके द्वारा स्थापित रीति-रिवाजों में परिवर्तन करना—पर वास्तव में यह अक्सर गलत समझ और विरोध की प्रतिक्रिया होती है। सच यह है कि उद्धारकर्ता ने शास्त्रों की गूढ़ता, सत्यापन और नया जीवन दिया, परन्तु उसे नष्ट या पूरी तरह से गंवाने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
दो मुख्य विषय
महत्वपूर्ण क्रॉस-रेफरेंसेस
1) यीशु के शिक्षण में पुरानी व्यवस्था के साथ नई व्यवस्था की संगति पर प्रकाश—यह बताता है कि वह पवित्रता और विश्वास के नवीन आयाम खोलते हैं, न कि केवल पुराने नियम को रद्द करना।
2) प्रेरितों के बीच संघर्ष का चित्रण—इससे संकेत मिलता है कि सुसमाचार का प्रचार कभी-कभी आलोचना और आशंका का सामना करता है, पर सत्य की खोज निरंतर चलती है।
3) प्रस्तावित नये नियम के युग में पाप और पवित्रता के अर्थ में स्पष्टता—नए आयामों के आगमन से आस्था की परख और अधिक गहरी होती है।
कथन-उद्धरण (पूर्व-आधारित टिप्पणीकारों से चयनित, केवल संक्षिप्त उद्धरण)
Matthew Henry: “यहूदिनों के मन में यीशु के संपर्क का परिणाम अक्सर गलत धारणा बनना था; परंतु उद्धार के स्रोत में विश्वास की दृढ़ता आवश्यक है।”
Albert Barnes: “यह वाक्य दिखाता है कि कुछ लोग बाहरी रीति-रिवाज़ों को ही उद्धार मान लेते हैं; वास्तविक परिवर्तन हृदय का परिवर्तन है।”
Adam Clarke: “ईश्वर की योजना में नया अनुबंध पुराने अनुबंध से परे नहीं, बल्कि उसे पूर्ण करना है; यीशु का आगमन परिवर्तन का कारण बना, न कि कर्मों की जगह लेना।”
व्यावहारिक विचार
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह पंक्ति संकेत देती है कि यीशु का आगमन और उसकी शिक्षा पुरानी परंपराओं के साथ संघर्ष कर सकती है, पर उसका लक्ष्य जीवन को नया बनाना, पाप से मुक्ति और प्रेम-आधारित आस्था प्रदान करना है। सत्य की खोज में विश्वासयोग्यता बनाए रखना आवश्यक है, ताकि हम व्यवस्था के भीतर भी उद्धार-यात्रा को सही दिशा में बढ़ा सकें।