Old Testament
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आमोस 7:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
इसके विषय में भी यहोवा पछताया; और परमेश्वर यहोवा ने कहा, “ऐसी बात फिर न होगी।”
आमोस 7:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
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आमोस 7:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
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न्यायियों 2:18 (HINIRV) »
जब-जब यहोवा उनके लिये न्यायी को ठहराता तब-तब वह उस न्यायी के संग रहकर उसके जीवन भर उन्हें शत्रुओं के हाथ से छुड़ाता था; क्योंकि यहोवा उनका कराहना जो अंधेर और उपद्रव करनेवालों के कारण होता था सुनकर दुःखी था*।

न्यायियों 10:16 (HINIRV) »
तब वे पराए देवताओं को अपने मध्य में से दूर करके यहोवा की उपासना करने लगे; और वह इस्राएलियों के कष्ट के कारण खेदित हुआ।

आमोस 7:6 पर संदर्भीय व्याख्या
आमोस 7:6 में यहोवा के विचार में परिवर्तन का दृश्य एक चेतावनी-भरी घटना है: उसने पहले यह कहा कि पूर्ववत स्थिति बहाल होगी, फिर पछताकर कहा कि ऐसी बात फिर न होगी। यह कविता दर्शाती है कि भविष्यवक्ता Amos के दावे के अनुरूप परमेश्वर अब्राह्मिक व्यवस्था में परिवर्तन के साथ कदम उठाते हैं, क्योंकि जनसमुदाय के पथ ठीक नहीं थे और उनके पापों के कारण एक नया निर्णय लिया गया। यह वाक्यांश हमने देखती है कि परमेश्वर की योजना समय के अनुसार बदल सकती है, और वह क्षमा और निर्णय के बीच संतुलन बनाते हैं।
मुख्य विचार
टिप्पणी से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
ईतिहासिक संदर्भ में Amos के आगमन से पहले इस्राएल के उत्तर-दक्षिण राज्यों में धार्मिक भ्रष्टाचार और सामाजिक अन्याय बढ़ा हुआ था। परमेश्वर अपनी कड़ी चेतावनी देकर मंच पर न्याय और कृपा दोनों को साथ लाते दिखते हैं। इस वचन में यह भी संकेत है कि परमेश्वर का निर्णय टाल सकता है, पर वह अंतिम रूप से पथभ्रष्ट व्यवस्था को सुधारने के लिए उचित कदम उठाता है।
स्वर और विषयगत घटक
यहोवा का पछताना एक रूपक है जो कहता है कि परमेश्वर ने समाज के पापों के परिणामों को स्थिर नहीं माना; उसने जो किया वह एक चेतावनी के रूप में था। यह पाठ पाठक को याद दिलाता है कि सुधार के अवसर मिलते हैं, पर सक्रिय पश्चात्ताप अनिवार्य है।
केंद्रीय किनारे: दो-तीन पुष्टि बिंदु
- परमेश्वर का परिवर्तनशील निर्णय मानव प्रतिक्रिया पर निर्भर हो सकता है।
- पाप के परिणाम कभी-कभी स्थायी नहीं रहते, अगर विनम्रता से पश्चात्ताप हो।
- न्याय और दया के बीच संतुलन में प्रेरणा मिलती है कि कैसे समुदायों को सुधारने के लिए दया की आवश्यकता है।
अनुशीलन-पूर्वकCross-References
1) यूहना 3:16 जैसी पंक्तियाँ—क्योंकि परमेश्वर ने प्रेम से दी है ताकि जीवन मिले; यह दर्शाती है कि परिवर्तन और पश्चात्ताप से नई राह संभव है।
2) रोम 2:4—कृपा के कारण धीरज से नहीं, बल्कि मानवीय अवज्ञा पर भी दया का मार्ग खुलता है; यह वचन भी वही संदेश देती है कि परमेश्वर के निर्णय मानव उत्तर पर निर्भर रहते हैं।
3) योहेद 1:24-25—पिता के चरणों में रहते हुए यहोवा की सुरक्षा और मदद प्राप्त होती है, जब मनुष्य ईमानदारी से लौटते हैं।
व्यावहारिक विचार
जो पाठ अब हमारे भीतर उभर कर आता है वह यह है: अपने व्यवसाय, सांस्कृतिक रीति-रिवाज, और सामाजिक व्यवहार में जो भी अव्यवस्था है, उस पर नजर रखें। यदि हम सचेत, विनम्र पश्चात्ताप से लौटते हैं, तो परमेश्वर की राह हमारे लिए खुल सकती है। अपने असम्बद्ध तरीकों को पहचानें और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के साथ-साथ व्यक्तिगत पापों से भी मुक्त होने को तरजीह दें।
संक्षेप
आमोस 7:6 ईमानदार चेतावनी देता है कि परमेश्वर के निर्णय कभी-कभी जनसमुदाय की गतिशीलता पर निर्भर होते हैं। पश्चात्ताप और समाजिक सुधार की यह मांग पुनः उठती है ताकि जीवनरेखा में यथार्थ परिवर्तन आ सके।
पूर्वत उल्लेखित उद्धरण
इस पाठ के लिए Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संकलन से आवश्यक विचार समाहित किये गए हैं; उन्हें स्पष्ट उद्धरण के रूप में नीचे दिया गया है:
- "पश्चात्ताप के साथ दया और न्याय का संतुलन परमेश्वर के निर्णयों में स्पष्ट है।" (उद्धरण संक्षेप, Matthew Henry के विचारों से प्रेरित)
अनुदेश: ऊपर दी भाषा एकीकरण में संकुचित रूप से सार्वजनिक-डायरेखित टिप्पणी के अनुसार है।