Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
व्यवस्थाविवरण 1 व्यवस्थाविवरण 2 व्यवस्थाविवरण 3 व्यवस्थाविवरण 4 व्यवस्थाविवरण 5 व्यवस्थाविवरण 6 व्यवस्थाविवरण 7 व्यवस्थाविवरण 8 व्यवस्थाविवरण 9 व्यवस्थाविवरण 10 व्यवस्थाविवरण 11 व्यवस्थाविवरण 12 व्यवस्थाविवरण 13 व्यवस्थाविवरण 14 व्यवस्थाविवरण 15 व्यवस्थाविवरण 16 व्यवस्थाविवरण 17 व्यवस्थाविवरण 18 व्यवस्थाविवरण 19 व्यवस्थाविवरण 20 व्यवस्थाविवरण 21 व्यवस्थाविवरण 22 व्यवस्थाविवरण 23 व्यवस्थाविवरण 24 व्यवस्थाविवरण 25 व्यवस्थाविवरण 26 व्यवस्थाविवरण 27 व्यवस्थाविवरण 28 व्यवस्थाविवरण 29 व्यवस्थाविवरण 30 व्यवस्थाविवरण 31 व्यवस्थाविवरण 32 व्यवस्थाविवरण 33 व्यवस्थाविवरण 34Verse
व्यवस्थाविवरण 31:1 व्यवस्थाविवरण 31:2 व्यवस्थाविवरण 31:3 व्यवस्थाविवरण 31:4 व्यवस्थाविवरण 31:5 व्यवस्थाविवरण 31:6 व्यवस्थाविवरण 31:7 व्यवस्थाविवरण 31:8 व्यवस्थाविवरण 31:9 व्यवस्थाविवरण 31:10 व्यवस्थाविवरण 31:11 व्यवस्थाविवरण 31:12 व्यवस्थाविवरण 31:13 व्यवस्थाविवरण 31:14 व्यवस्थाविवरण 31:15 व्यवस्थाविवरण 31:16 व्यवस्थाविवरण 31:17 व्यवस्थाविवरण 31:18 व्यवस्थाविवरण 31:19 व्यवस्थाविवरण 31:20 व्यवस्थाविवरण 31:21 व्यवस्थाविवरण 31:22 व्यवस्थाविवरण 31:23 व्यवस्थाविवरण 31:24 व्यवस्थाविवरण 31:25 व्यवस्थाविवरण 31:26 व्यवस्थाविवरण 31:27 व्यवस्थाविवरण 31:28 व्यवस्थाविवरण 31:29 व्यवस्थाविवरण 31:30



व्यवस्थाविवरण 31:17 — एक चेतावनी और आत्म-विश्लेषण
यह पद बोरान के समय की कठिनाई को दर्शाता है जब परमेश्वर उनके एकाग्र विश्वास में कमी के कारण कष्टों का सामना कराते हैं। यह न केवल दंड की कठोर भाषा है, बल्कि हार मान लेने वाले मनोभाव का स्पष्ट संकेत भी है। पाठक को यह समझना चाहिए कि परमेश्वर की उपस्थिति के बिना जीवन में विपत्ति आने की संभावना बढ़ जाती है और खेदजनक निष्कर्ष निकल सकता है कि वेह परमेश्वर उनसे दूर चले गए।
पंक्ति-स्तर पर पाठ की स्पष्ट व्याख्या
पंक्ति कहती है कि उस समय जब कोप भड़केगा, परमेश्वर अपने बच्चों को त्याग सकता है और मुँह छिपा लेगा; वे तब आहार बन जाएँगे और विपत्तियाँ उन्हें घेर लेंगी। यह एक धार्मिक-आत्मिक स्थिति है जिसमें लोगों ने अपने आराध्यत्व और विश्वास को संकट के समय स्थिर नहीं रहने दिया। यह विवरण यह दर्शाता है कि विश्वास-आचरण और परमेश्वर के साथ संबंध टूटने पर जीवन में सुख-सुविधाएं भी छीन जाती हैं और लोग वास्तविकता से जूझते हैं।
मुख्य शिक्षा: परमेश्वर की उपस्थिति बनाम अनुपस्थिति
इस वाक्य की तल से उभरती शास्त्रार्थ शिक्षा यह है कि परमेश्वर के सामर्थ्य और सहायता के बिना मनुष्य असहाय और लक्ष्यहीन हो सकता है। कठोर स्थिति में भी अर्धविश्वासी-प्रवृत्ति उठती है, परन्तु यह भी स्पष्ट है कि परमेश्वर दरअसल तब भी जागरूक रहता है, और पाप के परिणामस्वरूप यह चीत्कार, पश्चाताप और पुनःसमर्पण की मांग करता है।
अनुरूप छंदों के साथ तुलना
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि विपत्ति के पीछे एक चेतावनी और एक अवसर है— अपने राम के साथ फिर से जुड़ने का अवसर।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनके सार बताते हुए
पठनीय संदर्भ जिन्हें इस पद से जोड़ा जा सकता है:
इन क्रॉस-रेफरेंसेस से पाठक यह समझते हैं कि कठिन समय में परमेश्वर के साथ दृढ़ संबंध बनाए रखना ही वास्तविक सुरक्षा है।
सार-सारांश
व्यवस्थाविवरण 31:17 यह बताता है कि परमेश्वर की दूरी या उसके कोप के समय मानवता कितनी कमजोर पड़ सकती है, पर यह भी संकेत है कि यह चेतावनी आत्म-परिवर्तन और पुनःस्थापन का अवसर है। एक विनम्र भक्ति के साथ अपने जीवन को फिर से समर्पित करें, और विश्वास के साथ आशावान रहें कि परमेश्वर का मध्यस्थत्व और सहारा हमारे साथ है।
महत्वपूर्ण उद्धरण (संदर्भित वक्तव्य):
“उस समय मेरा कोप इन पर भड़केगा, और मैं भी इन्हें त्याग कर इनसे अपना मुँह छिपा लूँगा…”
इस प्रकार की पंक्तियाँ, मैथ्यू हेन्री, एलबर्ट बARNES, और एडम क्लार्क के टिप्पणी-संदर्भों में भी उद्धृत होतीं हैं, जहाँ वे कहे गए भाव को जागरूक समझ के साथ देखते हैं कि धार्मिक अवहेलना के परिणाम कैसे भयावह उपस्थिति बनाते हैं।