Old Testament
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विध्वंस से सीख: व्यवस्थाविवरण 31:4 का अर्थ
इस पवित्र वचन में यहोवा के उस पवित्र न्याय और दिव्य सच्चाई की याद दिलाई गई है जो उसने पूर्वजों के समय दिखायी थी: जैसा उसने एमोरियों के राजा सीहोन और ओग तथा उनके देश को नष्ट किया, उसी प्रकार वह अन्य जातियों के विरुद्ध भी करेगा। यह बताता है कि ईश्वर का विजय-कार्य सार्वभौम है और वह अपने लोगों के विरुद्ध असुरों और विरोधियों के जाल को समाप्त कर देता है ताकि उनका मार्ग साफ हो जाए।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
व्यवस्थाविवरण के यह भाग विनिर्देश करता है कि कोहेनियन-यात्रा के समय इस्राइल के prior आक्रमण-यात्राओं के पीछे की प्रेरणा क्या थी। सीहोन और ओग, जिनके राज्य-क्षेत्र ईश्वर ने उन पर गिराया, यह दर्शाते हैं कि परमेश्वर के निर्णय केवल एक स्थान-विशेष पर नहीं बल्कि उन शक्तियों पर भी लागू होते हैं जो विरुद्ध खड़ी होती हैं। इस वचन में उन जातियों के विरुद्ध भविष्य में होने वाले दमन की आशा निहित है जो ईश्वर के चिह्नित मार्ग को रोकते हैं।
व्याख्यात्मक अवलोकन
दो-तीन प्रमुख विचार
संयोजन तात्पर्य: अन्य साक्ष्यों से सम्बन्ध
कई क्रिस्तीय टिप्पणीकार यह देखते हैं कि पूर्वकाल में किए गए दिव्य विनाश के स्मरण से यह सन्देश निकलता है कि परमेश्वर अन्याय के विरुद्ध न्याय के साथ आक्रमण करता है, ताकि उसकी योजना और वाचा सुरक्षित रहें। साथ ही यह यातना और न्याय के बीच संतुलन पर संकेत देता है कि ईश्वर हर जड़ flaw पर नज़र रखता है और पाप के अंत को निर्धारित करता है।
क्रॉस-रेफरेंसेज:
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष
हम को यह समझना चाहिए कि ईश्वर के न्याय और कृपा एक साथ चलते हैं। जब हम अपने जीवन के क्षेत्रों में अवरोध देखते हैं या अत्याचार का सामना करते हैं, तब भी परमेश्वर की योजना सत्य और सुरक्षित मार्ग प्रदान करती है। आत्म-निर्भरता छोड़कर, विश्वास-पूर्वक ईश्वर की समृद्ध कृपा पर निर्भर रहना ही वास्तविक विजय है।
महत्वपूर्ण उद्धरण (जहाँ उपलब्ध): यदि आपके पाठ में Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के सटीक वाक्यांश मिलें, उन्हें यहां उद्धृत किया गया है—परन्तु संक्षेप में ही उद्धरण के पूर्ण टेक्स्ट से बचा गया है।