Old Testament
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सभोपदेशक 8:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तब मैंने आनन्द को सराहा, क्योंकि सूर्य के नीचे मनुष्य के लिये खाने-पीने और आनन्द करने को छोड़ और कुछ भी अच्छा नहीं, क्योंकि यही उसके जीवन भर जो परमेश्वर उसके लिये धरती पर ठहराए, उसके परिश्रम में उसके संग बना रहेगा।
सभोपदेशक 8:15 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
सभोपदेशक 8:15 समानांतर पद और संबंधित वचन
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सभोपदेशक 2:24 (HINIRV) »
मनुष्य के लिये खाने-पीने और परिश्रम करते हुए अपने जीव को सुखी रखने के सिवाय और कुछ भी अच्छा नहीं। मैंने देखा कि यह भी परमेश्वर की ओर से मिलता है।

सभोपदेशक 5:18 (HINIRV) »
सुन, जो भली बात मैंने देखी है, वरन् जो उचित है, वह यह कि मनुष्य खाए और पीए और अपने परिश्रम से जो वह धरती पर करता है, अपनी सारी आयु भर जो परमेश्वर ने उसे दी है, सुखी रहे क्योंकि उसका भाग यही है।

सभोपदेशक 3:12 (HINIRV) »
मैंने जान लिया है कि मनुष्यों के लिये आनन्द करने और जीवन भर भलाई करने के सिवाए, और कुछ भी अच्छा नहीं;
सभोपदेशक 8:15 का महत्व और उसका संदेश
यह पद हमें इस संसार की कठिन वास्तविकता में संतोष और परमेश्वर-परित्राण की गूंज सुनाने का अवसर देता है। सभोपदेशक हर दिन के अस्थिर अनुभवों के बीच एक सरल, ठोस संदेश प्रस्तुत करते हैं: जीवन में आनंद और भोजन-पीने का आशीर्वाद ईश्वर की कृपा से है, और यह ही इस जीवन का सच्चा उपहार है। भौतिक वस्तुओं पराधिकृत रूप से नहीं, बल्कि उनके माध्यम से परमेश्वर के पालन-पोषण और अनुभव की अनुभूति में आनंद को बनाए रखना हमारी जीवन-यात्रा का उद्देश्य है।
असली संदर्भ और संरचना
सभोपदेशक 8 में लेखक सत्ता-व्यवस्था, अधिकार, और समय के साथ जुड़ी निरपेक्षताओं का विमर्श करते हैं। अध्याय 8:15 वह क्षण है जब वक्तव्य स्पष्ट रूप से कहता है कि परिश्रम के बावजूद जीवन में आनंद को बाँटना और उसे जीवित रहने देने की परमेश्वर की इच्छा है। यहाँ “सूर्य के नीचे मनुष्य के लिये खाने-पीने और आनन्द करने” के साथ एक स्थिरता और दायित्व जुड़ा है: यह सब परमेश्वर के दिए गए समय और परिस्थितियों के अनुरूप है। आशय यह है कि ईश्वर ने इस जीवन को जीने के लिए वस्तुएँ दीं हैं, और हमारा उत्तर उनके दया-प्रेम की सराहना के साथ आनंद मनाने में है।
मुख्य संदेश
पश्चात-उद्धारक संदर्भ
यह विचार-विमर्श निम्न विषयों से जुड़ता है:
उद्धृत विचार संसाधन
नीचे दिए गए तीन प्रमुख सार्वजनिक डोमेन टिप्पणियाँ संकेत देती हैं कि कैसे यह पाठ गहराई से समझा गया है:
Matthew Henry का दृष्टिकोण: यह पद मानव-आनंद और परमेश्वर-योजना के बीच संतुलन का पाठ है; जीवन की वास्तविक खुशी के लिए उसका स्रोत परमेश्वर की कृपा है.
Albert Barnes का दृष्टिकोण: आनंद को एक धर्म-संरक्षक उपहार के रूप में देखना चाहिए, जिसका उद्देश्य न केवल स्वार्थी सुखों को प्राप्त करना बल्कि परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार जीवन के कर्मों को निभाना है.
Adam Clarke का दृष्टिकोण: इस आनंद को ईश्वर की व्यवस्था के अनुरूप समझना चाहिए, सरल-सी बात है कि परमेश्वर ने जीवन को जीवनबोध देने के लिए समरथा दी है और इसे आशीर्वाद के रूप में स्वीकारना चाहिए।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षिप्त, सम्बन्धित)
आध्यात्मिक चिंतन
हम इस संसार की दौड़ में अक्सर खुशी के स्रोतों को बड़े मानते हैं—परन्तु यह पद सिखाता है कि वास्तविक आनंद और भोजन-पीने की सुख-सुविधाएँ निरंतर उपलब्ध नहीं रहतीं, परन्तु परमेश्वर के साथ जीवन-सम्पर्क में एक स्थायी संयोग बनता है। संतोष का सार यही है कि हम जीवन के हर अवसर को ईश्वर की देन मानकर उसका आभार व्यक्त करें और अपने परिश्रम के साथ साथ अनुदान-प्राप्त आनंद को भी सम्मान दें।