Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यहेजकेल 1 यहेजकेल 2 यहेजकेल 3 यहेजकेल 4 यहेजकेल 5 यहेजकेल 6 यहेजकेल 7 यहेजकेल 8 यहेजकेल 9 यहेजकेल 10 यहेजकेल 11 यहेजकेल 12 यहेजकेल 13 यहेजकेल 14 यहेजकेल 15 यहेजकेल 16 यहेजकेल 17 यहेजकेल 18 यहेजकेल 19 यहेजकेल 20 यहेजकेल 21 यहेजकेल 22 यहेजकेल 23 यहेजकेल 24 यहेजकेल 25 यहेजकेल 26 यहेजकेल 27 यहेजकेल 28 यहेजकेल 29 यहेजकेल 30 यहेजकेल 31 यहेजकेल 32 यहेजकेल 33 यहेजकेल 34 यहेजकेल 35 यहेजकेल 36 यहेजकेल 37 यहेजकेल 38 यहेजकेल 39 यहेजकेल 40 यहेजकेल 41 यहेजकेल 42 यहेजकेल 43 यहेजकेल 44 यहेजकेल 45 यहेजकेल 46 यहेजकेल 47 यहेजकेल 48Verse
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सूचना-भिन्नार्थ: यहेजकेल 32:19 का सरल अर्थ
इस पद में यरूशलेम के आसन्न विग्रह के संदेश को यहेजकेल किसानों-निंदा के रूप में व्यक्त किया गया है। प्रश्न उठता है कि “तू किस से मनोहर है?” से मर्म यह है कि कब्र की सन्नाटा-सी स्थिति में कौन-सी शक्ति या राजा इस प्राणहीनता को नहीं छोड़ती? उत्तर यह है कि नोह, मिस्र, नीनवे आदि विशाल साम्राज्यों के पतन के साथ-साथ, परमेश्वर के क्रोध के सामने सब पराधीन रहते हैं; मनुष्य की महानता भी क्षणभंगुर है जब वह 하나님 के प्रति निराधार रहता है।
पार्श्व-विवेक (Contextual background)
यहेजकेल की किताब मेंúa राज्य–युग का अन्त, बंधन के समय का संकेत और बंधनों से उबारने की आशा एक साथ मिलती है। संदर्भ यह दर्शाता है कि विश्व-राजाओं की महिमा और सेना की ताकत एक क्षण में समाप्त हो सकती है, जब परमेश्वर का न्याय यथार्थ में उतरता है। इस विभाग में यह बताने के उद्देश्य से है कि अधर्म के स्थायित्व पर भी अंत आता है और पृथ्वी के शक्तिशाली शासक शून्य बना दिए जाते हैं।
व्याख्यात्मक विचार
छोटा विषय-सार ( thematic brief )
अनुसृत पाठ (Cross-references) और उनके सार
1) मिस्र के राजा और अन्य राष्ट्र-शासक के पतन के आलोक में यहेजकेल का संदेश—उच्च स्थानों की महिमा अंततः प्रकट नहीं होती; परमेश्वर के न्याय के सामने सब बराबर हैं।
2) अन्य prophecies में शोक-संदेशों के साथ यह भी दिखाया गया है कि पाप की स्थिर सत्ता अस्थायी है और उद्धारक के आने से परिस्थिति बदलती है।
3) परमेश्वर के सामने न्याय का सिद्धांत—अहंकार के बाद विनय और दया की भूमिका—यह स्पष्ट करता है कि शासन-शक्ति का वास्तविक मूल्य नैतिक एकता और ईमानदार आचरण से तय होता है।
यथार्थ-उपयोग (Practical takeaway)
हमारी पहचान धन-शक्ति या राजनीतिक प्रभाव से नहीं, बल्कि परमेश्वर के नियम के अनुरूप जीवन बिताने से मानी जाती है। स्थाई मान्यता वही है जो सत्य, नम्रता और दया के साथ समाज-जीवन में प्रतिफलित हो।)
पूर्व-लेखक-उद्धरण (Quotations from public-domain commentators)
यह भाग विश्लेषण हेतु संकलित है—अगर संलग्न उद्धरण उपलब्ध हों, तो नीचे दिए गए नामों से छोटे-छोटे उद्धरण शामिल किए जा सकते हैं: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke. फिलहाल मूल पाठ पर निर्भर रहते हुए, हमने उनके पूर्ण उद्धरण नहीं जोड़े हैं, पर उनके विचार-संकेतों का उपयोग समरूप रूप से किया गया है:
नोट: नीचे दिए गए विचार उनकी सार्वजनिक-डोमेन व्याख्यानों के सामान्य प्रवृत्ति के अनुरूप हैं, परन्तु यहाँ विशेष शब्द-चयन नहीं दोहराए गए।
सार: यहेजकेल 32:19 का यह संकेत कि पृथ्वी के शासक कितने भी महान क्यों न हों, परमेश्वर के न्याय के सामने क्षणभंगुर हैं, यह पाठ हमें विनय और परमेश्वर-भक्ति का सच्चा मूल्य सिखाता है।