Old Testament
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यहेजकेल 6:9 का हिंदी टीका (HINIRV)
यहेजकेल के भाग 6 में परमेश्वर के निर्णय के अनुसार इस्राइल के पतन के कारण प्रस्तुत किया गया है। इस כרचना में यह दर्शाया गया है कि जब लोग बार-बार उद्धार के अवसरों को ठुकराते हैं, तो उनके भीतर के व्यभिचार और देवी-देवताओं के पाप उनकी रीति-नीति बन जाते हैं। यह वचन उन बचे हुए लोगों के बारे में है जो अन्यजातियों में बाँधे जाने के समय भी परमेश्वर को याद करेंगे, और अपने हृदय की गिरावट को पहचानेंगे कि कैसे हमारा मन व्यभिचारी बन चुका है और आँखें मूर्तियों पर टिकती हैं, जिससे यहोवा का मन टूट गया है।
मुख्य अर्थ
वचन इस बात की स्मृति कराता है कि परमेश्वर की करुणा और पवित्रता के बीच मानव स्वभाव कितना दूर जा सकता है। जो लोग घटनाओं के कारण अपने देश से दूर जुदा होते हैं, वे अंतःकरण में अपने बनाए पापों को पहचानेंगे, और यह भी कि उनका हृदय किस प्रकार स्वतः ही भटकाव की ओर बढ़ा—व्यभिचार और मूर्तिपूजा के कारण। यह स्मरण और विवेचना विश्वास को फिर से उद्धार की ओर मोड़ने की मांग है; क्योंकि परमेश्वर के मन को दुख पहुँचाने वाले पापों से ही वह घृणा और न्याय प्रदर्शित होता है।
दो-तीन प्रमुख विषय
अन्य बाइबल अंशों से संबंधी प्रसंग
- संदर्भ: यहेजकेल के अन्य भागों में गिरे हुए राज्य के भीतर पाप के परिणाम स्पष्ट होते हैं, जैसे अभिलाषा-भंग और मूर्तिपूजा की प्रवृत्ति का बढ़ना। यह वचन इन प्रवृत्तियों के अंत में पूर्णत: उद्धार के लिए ईश्वरीय क्रिया की मांग की झलक देता है।
- संदर्भ: यहोवा के न्याय के साथ पश्चात्ताप की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है; अन्यत्र भी यह दर्शाता है कि पाप का चिकित्सक प्रभाव repentance के द्वारा ही खुल सकता है।
- संदर्भ: पुराने नियम के न्याय और अनुग्रह दोनों का संतुलन दिखाते हैं; मूर्तिपूजा से दूरी बनाकर ही जनता पुनः पवित्रता के मार्ग पर आ सकती है।
व्यावहारिक विचार
अपने जीवन के उस क्षेत्र की पहचान करें जहाँ आप “दूर जाने” की प्रवृत्ति अनुभव कर रहे हैं—व्यभिचार, क्षुद्र इच्छा, या अधूरा विश्वास। यह वचन हमें याद दिलाता है कि ईश्वर की आँख में पाप जहाँ-जहाँ है, वहाँ वहाँ उसे पहचानना चाहिए और उसकी क्षमा के लिए लौटना चाहिए। यह भी याद रखें कि परमेश्वर का मन दुखी होता है, परन्तु सत्य-मन से लौटने पर उसकी करुणा फिर से उभर आती है।
छोटी-सी समरी
यहेजकेल 6:9 यह कहता है कि जो लोग विभ्रम में पड़े हैं और अपने व्यभिचारपूर्ण हृदय को पहचानते हैं, वे मूर्तिपूजा और भटकाव के कारण परमेश्वर के मन को दुखी करते हैं; परन्तु repentance और स्मरण से वे फिर से सच के पथ पर लौट सकते हैं।
कथित पूर्व-उद्धरण (उद्धृत स्रोतों से जो_exact_ पंक्तियाँ उपलब्ध हों)
इस खंड में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डायरेक्ट उद्धरणों के छोटे भाग उपलब्ध हो सकते हैं; आवश्यकता पड़ने पर नीचे दिया गया है: - "Matthew Henry" के उद्धरणों से, अगर उपलब्ध, केवल शाब्दिक अंश उद्धृत होंगे. - "Albert Barnes" के छोटे उद्धरण भी वैध पंक्तियों के रूप में प्रस्तुत हो सकते हैं. - "Adam Clarke" के संदर्भ-उद्धरण भी संभव हैं. नोट: यहाँ सटीक पूर्ण उद्धरण सीधे पाठ में प्रतिबंधित हैं; वे केवल आवश्यकता पड़ने पर संक्षेप में उपयोग किए गए होंगें।
क्रॉस-रेफरेंस और संक्षेप स्पष्टीकरण
1) यशाय 44:9-20 — मूर्तिपूजा की आलोचना और एकात्म विश्वास को पुनः पाने की आवश्यकता। इसके साथ यह दिखता है कि मनुष्य मूर्ति-उपासना के स्थान पर परमेश्वर के एकात्मक प्रेम को स्वीकार करे।
2) रोम 1:21-23 — अहंकारपूर्ण विज्ञान-अभिमान के कारण ईश्वर को छोड़ देने के परिणाम—हृदय अंधकार का विस्तार।
3) यहोशू 24:14-15 — चयन का आग्रह: अपने परमेश्वर की सेवा चुनें और अन्य देवताओं के पीछे न जाएं।