Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42



अय्यूब 25:4 पर सरल सार
यह पद कहता है: “फिर मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी कैसे ठहर सकता है? और जो स्त्री से उत्पन्न हुआ है वह कैसे निर्मल हो सकता है?” यहाँ दावे की सीमा स्पष्ट है: मनुष्य की नैतिकता और पवित्रता की सीमा परमेश्वर की महिमा के सामने अधूरी है।
पार्श्व-प्रसंग और मूल विचार
अय्यूब की पुस्तक में दोस्त-वादी विचारों के मध्य यह श्लोक एक तीखी, निंदात्मक टिप्पणी है जो दयालुता, पवित्रता और धर्मी ठहराव की मानव-आशाओं पर प्रश्न उठाती है। यह उद्धरण हास्यास्पद नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक सच को व्यक्त करता है: परमेश्वर के सत्या और एकदम पवित्र मानदंड के सामने मनुष्य और जन्म से हुए दोष-रहित उद्धरण भी सीमित हैं। यह अध्याय ज्यादातर तुलना-आधारित तर्कों को निष्पक्ष रखने की चेष्टा करता है, ताकि पाठक यह न माने कि धर्मეობयक्ति के आधार पर ही प्रतिष्ठा मिलती है।
विश्लेषणात्मक बिंदु
महत्वपूर्ण संदर्भ-संयोजन
इस verse के अर्थ को समझने के लिए नीचे दिए गए cross-references सहायक होते हैं:
संक्षेप में, यह श्लोक मानव आत्म-उत्कृष्टता के दावे की निंदा नहीं, बल्कि परमेश्वर की पवित्र नैतिक मानक के सामने हमारी निर्बलता की अनुभूति है।
संक्षिप्त थीमैटिक सूची
कार्यान्वयन-केंद्रित सीख
व्यावहारिक निर्णय: जब भी आप अपने आप को “औचित्य” के दायरे में आंकते हैं, तब परमेश्वर की पात्रता और grace के आधार पर छानना उचित है। किसी भी धार्मिक व्यवहार को यदि प्रेम, न्याय और आस्था से परे देखना पड़े, तो उसे सच का दायरा नहीं कहा जा सकता।
यहाँ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से मिलती-जुलती सूक्ष्म टिप्पणियाँ अनुशासन-पूर्वक संक्षेप में उद्धृत हैं:
“Man, by birth or merit, cannot stand before God’s pure righteousness.”
समापन टिप्पणी: इस पाठ से हमें स्मरण होता है कि पाप-ग्रहण, मनुष्य के जन्म से उत्पन्न अवगुण भी, परमेश्वर के पवित्र मानदंड के सामने टिक नहीं पाते। इसलिए आस्था-वंतGrace की आवश्यकता है, जो केवल परमेश्वर के उद्धारकर्ता पर निर्भर करती है।
छोटे cross-references के साथ स्पष्ट जोड़
- रोम 3:10–23: सभी ने पाप किया और महिमा से गिर गए; न्याय के लिए कृपा आवश्यक है।
- याकुब 2:1–4: वास्तविक आस्था का आचरण—बाहरी ढांचे से अधिक आंतरिक परिवर्तन की मांग।
- स्पष्ट नैतिकता बनाम दिव्य holiness:external धर्म-प्रदर्शन से आंतरिक transformed दिल का संयुक्त महत्व।