Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
योएल 2:1 योएल 2:2 योएल 2:3 योएल 2:4 योएल 2:5 योएल 2:6 योएल 2:7 योएल 2:8 योएल 2:9 योएल 2:10 योएल 2:11 योएल 2:12 योएल 2:13 योएल 2:14 योएल 2:15 योएल 2:16 योएल 2:17 योएल 2:18 योएल 2:19 योएल 2:20 योएल 2:21 योएल 2:22 योएल 2:23 योएल 2:24 योएल 2:25 योएल 2:26 योएल 2:27 योएल 2:28 योएल 2:29 योएल 2:30 योएल 2:31 योएल 2:32



यहोवा कहता है: अभी लौटो—कमजोर पर नहीं, पूरे मन से प्रार्थना
सार: योएल 2:12 में परमेश्वर कहता है किREPENTance—परिवर्तन और पूरी भावनात्मक लगन के साथ लौट आओ, अभी भी सुनो। आह्वान यह है कि उपवास, रोना-पीटना और आंतरिक परिवर्तन से अपनापन दिखाओ; केवल बाहरी क्रियाओं से नहीं, बल्कि पूरे मन से परमेश्वर के पास आना है।
संदर्भ पृष्ठभूमि
योएल एक छोटा-सा पुस्तक है जो दया और करुणा के साथ साथ पार्थिक उद्भावनाओं को उद्घाटित करता है। इस पाठ में यहोवा प्रकट करता है कि उसकी क्रोध के दिन भी मानव के भीतर परिवर्तन संभव है जब वह दृढ़ता से लौटे। उपवास और रोना-पीटना उसकी उपस्थिति के लिए एक मार्ग-संकेत हैं—क्योंकि परमेश्वर चाहत है कि हम उनका दिल खोलकर आस्तीनें चढ़ा कर सम्मुख हों।
व्याख्यात्मक अवलोकन
सारभूत थीमावली
अनुरूप क्रॉस-रेफरेंसेस
- व्यावहारिक आस्था के लिए: योएल 2:12 से जुड़ी अन्य प्रवचनों में जो स्पष्ट है, वह यह है कि आंतरिक परिवर्तन के लिए आह्वान बाह्य विधियों से आगे बढ़कर दिल की स्थिति पर केंद्रित है।
1) यहशीया 58:6–7: उपवास और दया के साथ रहने की वास्तविकता बतलाता है कि धार्मिक कर्म से अधिक मानव समुदाय की जरूरतें और दया के कार्य हमारे भित्ति-हृदय की परीक्षा करते हैं।
2) जेम्स 4:8: निकट आकर सीधे परमेश्वर से संबंध बनाने का बुलावा; ठोस पुनर्संयोजन और आत्म-स्वीकृति से पवित्रा संबंध बनता है।
3) मत्ती 6:16–18: उपवास का सही अर्थ—तुम्हारे भीतर प्रकट होना चाहिए, बाहर नहीं, ताकि वेरी-प्रकट होने से परमेश्वर तुम्हारा हृदय देखे।
उचित उद्धरण (यदि उपलब्ध)
John Henry (Matthew Henry), Albert Barnes, Adam Clarke के समान सार्वजनिक-डायरेक्टर टिप्पणीकारों के परिष्कृत विचार इस तथ्य के साथ मिलते हैं कि आंतरिक परिवर्तन ही वास्तविक संहिता है; परन्तु यहाँ एकदम ताजा, प्रयोगात्मक हिंदी टिप्पणी प्रस्तुत है।
सूत्रगत विचार और उद्धरण
यह भाग मुख्यतः शुद्ध सार है कि उपवास और पश्चाताप केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि हृदय से परमेश्वर के सामने आना है।
संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष