Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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यूहन्ना 10:36 पर टिप्पणी: यहूशुदा नहीं, परमेश्वर का पुत्र
यह पंक्ति यूहन्ना 10 में भीड़ के बहस के बीच परमेश्वर के पुत्र की पहचान की ठेस बन जाती है। यीशु ने अपने आध्यात्मिक और संस्थित अधिकार को स्पष्ट करते हैं कि अगर पिता ने उसे पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है, तो उसे भगवान का पुत्र कहने से वह निन्दा क्यों सहते हैं? यह संदेश एक ऐसी स्थिति को प्रस्तुत करता है जहाँ पृथ्वी के नेताओं और धार्मिक नेता परमेश्वर की योजना और प्रतिदिन के अनुभव के बीच दूरी को दर्शाते हैं।
पाठ का संक्षिप्त दृश्य
बयानों के बल पर यीशु अपने अस्तित्व और使命 की पुष्टि करते हैं। उन्होंने कहा कि वह परमेश्वर का पुत्र है जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है। लोग उसे निन्दा करते हैं क्योंकि वह अपनी पहचान और अधिकार को सीधे स्वीकार करते हैं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
यह वाक्य परमेश्वर के पुत्र के पद—जिन्हें यीशु ने तर्कपूर्ण रूप से प्रस्तुत किया—और धर्मी-लोक के धार्मिक पूर्वाग्रहों के बीच द्वंद्व को उजागर करता है। पिता द्वारा पवित्र ठहरना दर्शाता है कि यीशु का आना एक उद्देश्यपूर्ण दायित्व के साथ था, न कि मानव इच्छा के अनुसार। इस से यह स्पष्ट होता है कि क्राइस्ट की पहचान और उनके कृत्य, दोनों परमेश्वर की योजना के भीतर होते हैं, इसलिए मानवों के लिए उसे निन्दा के रूप में देखना एक प्रकार की आत्म-निन्दा है।
पवित्र ग्रंथ की तुलना
‑ नीचे दिए गए समान विचारों वाले बिंदु scriptures में मिलते हैं:
व्याख्या: यीशु ने अपने अद्वितीय रिश्ते और पिता के पासवाले ठहराव को एक ठोस दावा के रूप में प्रस्तुत किया। लोगों की निन्दा प्रायः उनके संदिग्ध हृदयों की प्रतिक्रिया है, न कि सत्य की कमी।
अनुप्रयोग
हम से अपेक्षा है कि हम यीशु के परमेश्वरत्व को उसकी भूमिका के प्रकाश में समझें—यह विश्वास जीवन के निर्णयों को दिशा देता है। जब चर्चित विचार या सामाजिक दबाव यीशु की पहचान को चुनौती दें, तब भी हमें सत्य के प्रति ईमानदार रहना चाहिए — प्रभु के पुत्र के रूप में उनकी शिक्षाओं को मानना और उनके कार्यों के साथ उनके उद्देश्य को समर्पित रहना।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में)
‑ यूहन्ना 5:18 — यीशु के पात्र का इब्राहीमी और धार्मिक कानूनों के प्रकाश में स्पष्टीकरण।
‑ यूहन्ना 11:4 — मृत्यु से जीवन तक की आशा, परमेश्वर के पुत्र के अधिकार के साथ।
‑ यूहन्ना 6:38–40 — पिता की इच्छा की पूर्णता और जीवन की धारा।
संक्षेप
यह वाक्य परमेश्वर के पुत्र की एक स्पष्ट पहचान है—पिता ने उसे पवित्र ठहराकर जगत में भेजा। निन्दा चाहकर भी सत्य की दिशा नहीं पलटती; हमारे लिए संदेश यह है कि यीशु के मिशन और उसकी पहचान को स्वीकारना जीवन के मार्गदर्शन का हिस्सा बने।
नोट: इस पाठ में Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के सार्वजनिक-domain योगदान से जुड़ी संक्षिप्त उद्धरण जरूरत के अनुसार शामिल किए गए हैं।