Old Testament
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यूहन्ना 10:1 यूहन्ना 10:2 यूहन्ना 10:3 यूहन्ना 10:4 यूहन्ना 10:5 यूहन्ना 10:6 यूहन्ना 10:7 यूहन्ना 10:8 यूहन्ना 10:9 यूहन्ना 10:10 यूहन्ना 10:11 यूहन्ना 10:12 यूहन्ना 10:13 यूहन्ना 10:14 यूहन्ना 10:15 यूहन्ना 10:16 यूहन्ना 10:17 यूहन्ना 10:18 यूहन्ना 10:19 यूहन्ना 10:20 यूहन्ना 10:21 यूहन्ना 10:22 यूहन्ना 10:23 यूहन्ना 10:24 यूहन्ना 10:25 यूहन्ना 10:26 यूहन्ना 10:27 यूहन्ना 10:28 यूहन्ना 10:29 यूहन्ना 10:30 यूहन्ना 10:31 यूहन्ना 10:32 यूहन्ना 10:33 यूहन्ना 10:34 यूहन्ना 10:35 यूहन्ना 10:36 यूहन्ना 10:37 यूहन्ना 10:38 यूहन्ना 10:39 यूहन्ना 10:40 यूहन्ना 10:41 यूहन्ना 10:42



यूहन्ना 10:20 पर्षग: उनके शब्द और संदेश
यहाँ यूहन्ना के gospel में यीशु के अपने परिचितों के बीच प्रभाव का एक उल्लेख मिलता है। वह लोग जो यीशु के साथ थे या उसे समझना चाहते थे, वे उसे दुष्टात्मा से प्रेरित मानते थे या पागल कहकर.exclude नहीं किया कि वह सच बोल रहा है। यह परिच्छेद बताता है कि आगमन के समय कई लोग येशु की पहचान और उसका उद्देश्य नहीं समझ पाए और कुछ ने उसे हीन समझकर निंदा की।
पद का पाठ और संदर्भ
पद: उनमें से बहुत सारे कहने लगे, “उसमें दुष्टात्मा है, और वह पागल है; उसकी क्यों सुनते हो?”
यह वाक्य यूहन्ना 10 में स्थित है जहाँ यीशु अपने प्रतिकूलों के बीच अपने उद्देश्य और शक्तियों को स्पष्ट करते हैं। जहां एक ओर वह अपनी सुरक्षा और अधिकार पर जोर देते हैं, वहीं कुछ उनके भीतर दुष्टात्मा की चालाकी देख कर उसे गलत ठहराते हैं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
मुख्य संदेश यही है कि जब भरपूर प्रकाश और सत्य सामने आता है, तो हर व्यक्ति अपने हृदय की स्थिति के अनुसार प्रतिक्रियाएं देता है। कुछ लोग सहज विश्वास से देखते हैं और कुछ लोग संदेह, भय या पूर्वाग्रह के कारण Jesus को असत्यापित ठहराते हैं। इस वाक्य में यह स्पष्ट है कि आत्मीय ज्ञान, या रोशनी पाने की क्षमता, आत्मा-नज़र से जुड़ी है; जो प्रभु की कृपा से उपलब्ध होती है, उसे ही सच्ची शास्त्र-ज्ञान कहा जा सकता है।
पवित्र शास्त्रों के तुलनात्मक संदर्भ
यहाँ कुछ समकक्ष विचार अन्य नेक अंशों से मिलते हैं:
व्यावहारिक उपयोग और निर्गम
- विश्वासियों को यह समझना चाहिए कि सत्य की रोशनी में परीक्षा और आलोचना सामान्य है; धैर्य और नम्रता से उत्तर देना चाहिए।
- आत्म-निजी विवेक में स्पष्टता पाने के लिए प्रार्थना और पवित्र शास्त्र शरण चाहिए।
- जब दूसरों के विचार प्रभु के काम पर कटाक्ष करते हैं, तो हमें नम्रता से कारण पूछना चाहिए, परन्तु आत्म-विश्वास के साथ सत्य की रक्षा भी करनी चाहिए।
छोटे cross-reference के संकेत
- परमेश्वर के प्रकाश से बिना भेदभाव का एक दृष्टिकोण पाने के लिए—यूहन्ना 8:12 पर विचार करें कि प्रकाश में चलना जीवन की दिशा देता है।
- यीशु के दिव्य अधिकार पर विश्वास बनाये रखने के लिए—यूहन्ना 14:6 देखें कि यीशु ही जीवन का मार्ग है।
- सत्य के साथ हर परिस्थिति में साहस रखने के लिए—2 तीमथ 1:7 की आशा का स्मरण करें कि प्रभु ने हमें डर नहीं, बल्कि शक्ति की आत्मा दी है।
संक्षेपण
यूहन्ना 10:20 में वे लोग जो यीशु के संदेश को दुष्टात्मा की कारिस्तानी से जोड़ते हैं, वे एक ऐसे सत्य को समझने से चूक जाते हैं जो आत्मा-नज़र से जाना जाता है। यह पैराग्राफ सच बताता है कि आत्मा की दृष्टि के बिना पदार्थवादी निष्कर्ष अस्थिर होते हैं; परन्तु जो प्रभु के साथ चलना चुनते हैं, वे रोशनी में सत्य को पहचानते हैं और विश्वास को पुनः स्थापित करते हैं।
टिप्पणीकारी पंक्तियाँ (उद्धरण):
यदि आवश्यक हो तो, Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke की परंपरागत टिप्पणी से आवश्यक साफ़ उद्धरण उपयोग में लाए जाते हैं—पर वे मूल अर्थ के अनुरूप और सार्वजनिक-डोमेन स्वरूप में होंगे।
संदेश-सार: यीशु के प्रति सच्चे विश्वास की मांग में यह verse एक चेतावनी भी है कि तत्कालीन समाज में देखने के तरीके विविध थे; पर हृदय को खोलकर सत्य की पहचान करने वाले ही परमेश्वर के काम को सही रूप में समझ पाते हैं।