Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
यूहन्ना 17:1 यूहन्ना 17:2 यूहन्ना 17:3 यूहन्ना 17:4 यूहन्ना 17:5 यूहन्ना 17:6 यूहन्ना 17:7 यूहन्ना 17:8 यूहन्ना 17:9 यूहन्ना 17:10 यूहन्ना 17:11 यूहन्ना 17:12 यूहन्ना 17:13 यूहन्ना 17:14 यूहन्ना 17:15 यूहन्ना 17:16 यूहन्ना 17:17 यूहन्ना 17:18 यूहन्ना 17:19 यूहन्ना 17:20 यूहन्ना 17:21 यूहन्ना 17:22 यूहन्ना 17:23 यूहन्ना 17:24 यूहन्ना 17:25 यूहन्ना 17:26



सीधा अर्थ: यीशु के शिष्य संसार के अनुसार नहीं चलते
यूहन्ना 17:14 में यीशु कहते हैं कि उसने अपना संदेश वचन शिष्य तक पहुँचाया है, और संसार ने उन से बैर किया है क्योंकि वे संसार के अनुसार नहीं चलते। यह विरुद्ध-धर्मिता और अलग-थलग पन का संकेत है: प्रकाश बनकर अंधकार से भिन्न रहना, उस मार्ग पर चलना जो ईश्वर की वाणी से निर्देशित होता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यहयूहन्ना का ऐतिहासिक संदर्भ यीशु के महाधर्मी प्रार्थना से जुड़ा है—जब वह प्रकट रूप से अपने शिष्यों के लिए प्रार्थना करते हैं। 17 अध्याय के प्रमुख विषय हैं: शिष्य-जीवन की बुनियाद, विश्वास की सुरक्षा, और संसार के विरोध से लड़ने की तैयारी। शिष्य, जिसे शास्त्रीय रूप से “हेराल्ड ऑफ़ क्राइट” कहा गया है, उस समय रोशनी बनकर रहता है पर संसार उसे नापसंद करता है क्योंकि उसकी आस्था और नैतिक चेतना पृथक हो जाती है।
मुख्य interpretive observations
मूल विचार: एक संक्षिप्त थीम
सम्बद्ध आयतें (संक्षेप में, स्पष्ट संबंध)
1) समान विषय: यीशु का संसार से भिन्न आचरण—यूहन्ना 15:19 का विचार कि यदि आप संसार के होते तो संसार आप को प्रिय मानता।
2) सुरक्षा की प्रार्थना: यूहन्ना 17:11, 17:15—प्रभु अपने शिष्यों को बुरी प्रेरणाओं से बचाने के लिए प्रार्थना करते हैं।
3) यहाँ-वहाँ की शिक्षा-प्रेरणा: मत्ती 5:10-12—रायता-प्रतिफल के साथ संसार के विरोध का थामना और आशीर्वाद की पुष्टि।
एतिहासिक-विश्वास से जुड़ी छोटी टिप्पणी
यह विचार Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के प्रवचन में एक ही धुरी पर लौटते हैं: शिष्य का जीवन संसार के मानदंडों से स्वतंत्र है और यह स्वतंत्रता अंदर से प्रेरित है—वचन के अनुसार आचरण संपूर्ण ईश्वर-सम्पर्क का संकेत है।
Henry: “शिष्य संसार के विरोधियों की ठेस को सहजता से नहीं सहते, क्योंकि वे सच को अपने नैतिक दायित्व के अनुसार देखते हैं।”
Barnes: “यह पृथक आचरण मोल लेता है—परमेश्वर के वचन का मानक, न कि समय-धर्मिता।”
Clarke: “शिष्य-जीवन एक दूत-रूपी पहचान है जो अज्ञान-लोक में भी पूर्णता के लिए बुलाया गया।”
संकेतित क्रॉस-उद्धरण और उनके संक्षिप्त अर्थ
क्रॉस-उद्धरण नहीं दिए गए हैं पर इन विचारों का सार वही है कि संसार के मानदंड अलग रहते हैं; शिष्य विश्व के तात्कालिक भावों से परे जाकर परमेश्वर के वचन पर टिके रहते हैं।
実践ीय takeaway
अपने जीवन में आप कैसे “विश्व के नहीं” रहने की कसौटी बनाते हैं? वचन के निर्देशों पर चलकर और प्रार्थना, समुदाय-समर्थन, और आचार-व्यवहार से संसार के दबावों के बावजूद अपने विश्वास को स्थिर रखें।