Old Testament
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यूहन्ना 6:1 यूहन्ना 6:2 यूहन्ना 6:3 यूहन्ना 6:4 यूहन्ना 6:5 यूहन्ना 6:6 यूहन्ना 6:7 यूहन्ना 6:8 यूहन्ना 6:9 यूहन्ना 6:10 यूहन्ना 6:11 यूहन्ना 6:12 यूहन्ना 6:13 यूहन्ना 6:14 यूहन्ना 6:15 यूहन्ना 6:16 यूहन्ना 6:17 यूहन्ना 6:18 यूहन्ना 6:19 यूहन्ना 6:20 यूहन्ना 6:21 यूहन्ना 6:22 यूहन्ना 6:23 यूहन्ना 6:24 यूहन्ना 6:25 यूहन्ना 6:26 यूहन्ना 6:27 यूहन्ना 6:28 यूहन्ना 6:29 यूहन्ना 6:30 यूहन्ना 6:31 यूहन्ना 6:32 यूहन्ना 6:33 यूहन्ना 6:34 यूहन्ना 6:35 यूहन्ना 6:36 यूहन्ना 6:37 यूहन्ना 6:38 यूहन्ना 6:39 यूहन्ना 6:40 यूहन्ना 6:41 यूहन्ना 6:42 यूहन्ना 6:43 यूहन्ना 6:44 यूहन्ना 6:45 यूहन्ना 6:46 यूहन्ना 6:47 यूहन्ना 6:48 यूहन्ना 6:49 यूहन्ना 6:50 यूहन्ना 6:51 यूहन्ना 6:52 यूहन्ना 6:53 यूहन्ना 6:54 यूहन्ना 6:55 यूहन्ना 6:56 यूहन्ना 6:57 यूहन्ना 6:58 यूहन्ना 6:59 यूहन्ना 6:60 यूहन्ना 6:61 यूहन्ना 6:62 यूहन्ना 6:63 यूहन्ना 6:64 यूहन्ना 6:65 यूहन्ना 6:66 यूहन्ना 6:67 यूहन्ना 6:68 यूहन्ना 6:69 यूहन्ना 6:70 यूहन्ना 6:71



परमेश्वर के कार्य के लिये हम क्या करें?
यूहन्ना 6:28 में लोग यीशु से पूछते हैं कि परमेश्वर के कार्य करने के लिये हमें क्या करना चाहिए। इस सवाल में हमारे लिए तीन बातें साफ निकलती हैं: आवश्यकता का स्पष्टता, क्रिया की दिशा, और उद्देश्य की नीयत। यीशु इस अभिव्यक्ति में बतलाते हैं कि परमेश्वर के कार्य वही होते हैं जो परमेश्वर के द्वारा सुनियोजित और प्रेरित हों। भक्तों के लिये यह सवाल एकात्म साझा करता है कि ईश्वर के लक्ष्य को समझकर, वही कर्म करें जो विश्वास के साथ मेल खाते हों।
1) साहित्यिक संदर्भ और संदर्भ-परिपेक्ष्य
यह प्रश्न जड़ता से आ रहा है कि धार्मिक कर्मों की मात्रा नहीं, बल्कि उद्देश्य और सच्चे विश्वास का उत्थान जरूरी है। यूहन्ना के लेखन में यह स्पष्ट है कि यीशु ने अपने शिष्यों को आस्था के द्वारा निर्भर रहने के लिए कहा, न कि किसी बाहरी दिखावे के लिये। प्रेरणा एक आंतरिक परिवर्तन से जुड़ी है—“परमेश्वर के कर्म करने के लिये” हमारे भीतर ईश्वर के चमत्कारिक कार्य की तरफ फोकस होना चाहिए।
2) theological significance: आस्था, क्रिया और उद्धार
पहचान यह है कि धर्म की क्रियायें केवल नियमों के पालन से नहीं होतीं; बल्कि वे विश्वास, प्रेम और परमेश्वर के उद्देश्य के अनुरूप जीवन जीने से बनती हैं। यीशु की शिक्षा में यह प्रवृत्ति है कि परमेश्वर का काम वह नहीं जो चमत्कारों से लदे, बल्कि वह है जो आत्मा से संतुष्ट हो और परमेश्वर के पुत्र-प्रभाव को दर्शाये।
3) अन्य प्रार्थना-संदर्भों से जोड़ियाँ
- नीतिगत विश्वास: प्रेरितों के अन्य शिक्षणों में कहा गया कि कर्म सही तब होते हैं जब उनका स्रोत ईश्वर से आता है (आस्था के साथ त्रुटिहीन जीवन)।
- उद्धार का मार्ग: उद्धार के लिये पहले ईमान और स्मरण के साथ परमेश्वर के कार्यों पर भरोसा आवश्यक है; उसके बाद ही जीवन-परिवर्तन की क्रिया आती है।
- प्रेम-आचरण: प्रेम दिखाने वाले कर्म कभी-भी सूखे नियम नहीं होते, बल्कि आत्मा द्वारा प्रेरित उचित व्यवहार होते हैं।
4) विचारणीय प्रश्न (Reflection)
5) संक्षिप्त निष्कर्ष
यूहन्ना 6:28 का संदेश सरल है: परमेश्वर के कार्य करते हुए हमें अपने विश्वास के केंद्र को दृढ़ करना चाहिए और उन कर्मों को अपनाना चाहिए जो आत्मा से प्रेरित हों। यह जीवन का उद्देश्य है—परमेश्वर की महिमा और ईश्वर के काम का साक्ष्य, जो हमारे भीतर विश्वास के फल के रूप में प्रकट हो।
प्रासंगिक क्रॉस-रेफरेंस
- रोम 12:2—परिवर्तन के लिए मन-नवीनकरण की भूमिका; कैसे हमारी मंशा और तरीके ईश्वर के सिद्ध-कार्य के अनुरूप बनें।
- गलातियों 5:22-23—आत्मा के फलों के द्वारा क्रिया-जीवन का प्रमाण, जो विश्वास के साथ जुड़ी होती है।
- याकूब 2:14-17—विश्वास और कर्म की संगति; केवल विश्वास या केवल कर्म से उद्धार नहीं, दोनों का सम्मिलन आवश्यक है।
एज्यूड Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के भीतर सीधे उद्धरण संभव नहीं हैं, पर इन तीनों पादरियों की परंपरागत व्याख्याओं से निम्न बिंदु निकले हैं: आस्था के द्वारा ही परमेश्वर के कार्य संभव होते हैं, और कर्म उन्हें जीने का साधन बनते हैं। यदि आप एक-एक पंक्ति उद्धरण के लिए चाहें, तो मैं पंक्ति-वार संदर्भ दे सकता हूँ।