Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
यूहन्ना 8:1 यूहन्ना 8:2 यूहन्ना 8:3 यूहन्ना 8:4 यूहन्ना 8:5 यूहन्ना 8:6 यूहन्ना 8:7 यूहन्ना 8:8 यूहन्ना 8:9 यूहन्ना 8:10 यूहन्ना 8:11 यूहन्ना 8:12 यूहन्ना 8:13 यूहन्ना 8:14 यूहन्ना 8:15 यूहन्ना 8:16 यूहन्ना 8:17 यूहन्ना 8:18 यूहन्ना 8:19 यूहन्ना 8:20 यूहन्ना 8:21 यूहन्ना 8:22 यूहन्ना 8:23 यूहन्ना 8:24 यूहन्ना 8:25 यूहन्ना 8:26 यूहन्ना 8:27 यूहन्ना 8:28 यूहन्ना 8:29 यूहन्ना 8:30 यूहन्ना 8:31 यूहन्ना 8:32 यूहन्ना 8:33 यूहन्ना 8:34 यूहन्ना 8:35 यूहन्ना 8:36 यूहन्ना 8:37 यूहन्ना 8:38 यूहन्ना 8:39 यूहन्ना 8:40 यूहन्ना 8:41 यूहन्ना 8:42 यूहन्ना 8:43 यूहन्ना 8:44 यूहन्ना 8:45 यूहन्ना 8:46 यूहन्ना 8:47 यूहन्ना 8:48 यूहन्ना 8:49 यूहन्ना 8:50 यूहन्ना 8:51 यूहन्ना 8:52 यूहन्ना 8:53 यूहन्ना 8:54 यूहन्ना 8:55 यूहन्ना 8:56 यूहन्ना 8:57 यूहन्ना 8:58 यूहन्ना 8:59



यूहन्ना 8:5 पर commentary (HINIRV)
पद में पूछा गया प्रश्न यह है कि व्यवस्था के अनुसार पत्थराव की सजा किस स्त्री के लिए होनी चाहिए, और यीशु से यह अपेक्षा की जाती है कि वह क्या कहेंगे। यह घटना यूहन्ना के अनुसार अशुद्र और न्यायिक जाँच के वातावरण में घटती है, जब धार्मिक नेता ईसा से परीक्षा लेने के लिए उसे दुष्कृत्य में फंसाने का प्रयास करते हैं। पीछे से लैव्यवस्थाओं का संदर्भ दिया गया है, जो बताता है कि पत्थराव की सजा कब और किन परिस्थितियों में लागू होती थी।
मुख्य विचार
यह verse यीशु की दृष्टि से कानून और करुणा के संतुलन की संवेदनशीलता दिखाती है। स्त्री पर पत्थराव की मांग से आध्यात्मिक नेताओं की कठोरता उजागर होती है, जबकि यीशु की प्रतिक्रिया प्रेम और न्याय के बीच मार्ग दिखाती है। वह न केवल कानून का सम्मान करते हैं बल्कि दया व अनुशासन की वास्तविक प्रकृति को भी प्रस्तुत करते हैं।
दो-तीन मुख्य विषय
शास्त्रीय संदर्भ
मूल स्रोतों में लैव्यवस्था 20:10 का उल्लेख है कि पत्थराव के लिए एक स्त्री-प्रकरण में शत्रुता और पाप के प्रमाण की स्थिति में विधि क्या कहती है। इस तथ्य को सुसंगत ढंग से समझना आवश्यक है—यह बताते हैं कि यीशु कानून से विमुख नहीं, बल्कि उसमें परिवर्तनकारी दया की आहट सुनाते हैं।
अनुकूल cross-references (संलग्न दृष्टिकोण)
1) यूहन्ना 3:16 – प्रेम की क्रिया: उद्धार का उद्देश्य प्रेम है, न कि दंड।
2) मत्ती 7:1–5 – अन्यायपूर्ण न्याय vs. आत्म-नैतिकता: स्वयं को परख कर दूसरों पर टिप्पणी करना उचित नहीं।
3) vìयवस्था 2:13–14 – कानून की स्थापित धारणा और मनुष्य के हृदय की आवश्यकता: दया और सत्य की खोज।
व्यावहारिक विचार
इस पाठ से आधुनिक विश्वासियों के लिए पाठ है कि किसी दोषी के लिए व्यक्तिगत दया और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन आवश्यक है। यीशु का उत्तर हमें सिखाता है कि赦ण और सत्य साथ-साथ चलें—हम दूसरों के साथ सहानुभूति रखें, पर किसी भी परिस्थिति में न्याय से भागें नहीं।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यूहन्ना 8:5 हमें याद दिलाता है कि ईश्वर की व्यवस्था में दया का स्थान है, और यीशु इसे अपने व्यवहार में मूर्त रूप देते हैं। कानून की शास्त्रीयता सुरक्षित रहते हुए वह मनुष्यों के हृदयों की स्थितियों को समझते हैं और उनके लिए उद्धार का रास्ता खोलते हैं।
नोट: नीचे दिए उद्धरण स्पष्ट रूप से Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के से संबंधित स्पष्ट पंक्तियों के वास्तविक शब्द हो सकते हैं; तब भी यहाँ स्वतंत्र समन्वय और सार उपलब्ध कराया गया है।
नज़दीकी उद्धरण (कम मात्रा में, केवल संकेत)
Matthew Henry: “अशुद्ध पाप के सामने भी प्रेम की जीत है” (संकेतात्मक सार; पूर्ण टेक्स्ट के लिए देखें)
Albert Barnes: “कानून की मांग और दया की प्रेरणा—यीशु इन दोनों को एक साथ रखते हैं” (संकेतात्मक सार)
Adam Clarke: “धर्मियों के छल से मुक्त वास्तविक न्याय” (संकेतात्मक सार)