Old Testament
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यहूदा 1



यहूदा 1:25 का अर्थ और संदर्भ
सीधे शब्दों में कहें तो यह पद परमेश्वर के एकमात्र उद्धारकर्ता के महिमामय चरित्र की स्थिरता और अनंतता की पुष्टि करता है—यानी वही परमेश्वर हमारे उद्धारकर्ता, यीशु मसीह के द्वारा प्रकट महिमा, गौरव, पराक्रम और अधिकार सदियों से स्थिर हैं, और युग-युग तक बने रहेंगे।
संदर्भ-संभावना
यहूदा पत्र एक बड़ी बारम्बारता से सतर्कता, सजगता और विश्वास के ठहराव की मांग करता है क्योंकि ऐसे समय में गलत शिक्षाएं और दावेदार उद्धारकर्ता आ रहे थे। इस संदर्भ में अंतिम प्रशस्ति वह है जो परमेश्वर के एकत्व, यीशु मसीह की यथार्थ महिमा और प्रभुत्व को स्थापित करती है। यह उद्घोषणा पाठक को भरोसा देती है कि परमेश्वर के काम और महिमा में परिवर्तन नहीं आते; वह अनंत है और उसकी सत्तापूर्ति स्थिर है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
संरचित क्रॉस-रेफरेंसेज़
महत्वपूर्ण टिप्पणी (सार)
यहूदा 1:25 हमारे विश्वास की धुरी को पकड़ता है—यही वह परमेश्वर-उद्धारक है जिसकी महिमा, गौरव, पराक्रम और अधिकार अनंत है। यह अनुभूति हमें यह सीख देती है कि स्वतंत्र मन से उद्धार की खोज नहीं, बल्कि परमेश्वर के कार्य-स्वरूप पर भरोसा ही पर्याप्त है।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष
उद्धरण के लिए यहूदा 1:25 के साथ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संयोग-उद्धरण नीचे नहीं दिए गए हैं, क्योंकि यह अनुरोध संरक्षित है कि केवल आवश्यक संदर्भ और सार ही सामिल हों। यदि आप चाहें तो मैं उनके स्पष्ट वाक्यों के छोटे अंश (कड़ी-नक़ल) उद्धृत कर दूँ, परन्तु बिना पूर्ण पद पाठ के।