Old Testament
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प्रकाशितवाक्य 5:13 पर टिप्पणी (हिनिर्व)
यह-वाक्य दृश्य-परिचय का पूर्ण समापन है। स्वर्गीय सिंहासन पर बैठा भगवान के राजा के चारों ओर देव-समुदाय और हर सृष्टि की सृजनात्मक वस्तुएं एक स्वर से उसकी महिमा, स्तुति और अधिकार की गवाही देती हैं। इस अध्याय में खोली गई उत्सव-कीर्तनें पृथ्वी-आकाश के सभी शक्तिशाली और निर्बल जनों के लिए प्रभु के पूर्ण अधिपत्य को उद्घोषित करती हैं।
मुख्य अर्थ
वह मलिक जो सिंहासन पर बैठा है, उसकी महिमा, सम्मान, महिमा और राज पन्नों में एक पूर्ण, सार्वभौमिक स्वीकारोक्ति के साथ प्रकट होती है। स्वर्ग, पृथ्वी, और समुद्र—यानी समस्त सृजन—उसकी महिमा की गवाही दे रहे हैं। यह उद्घोषणा युग-युग तक के प्रभुत्व की ध्वनियों को एक साथ मिलाकर कहती है कि ईश्वर का शासन अनंत और अपरिवर्तित है।
मुख्य विषय
नज़दीकी क्रॉस-रेफरेंस
- यशाय 6:3 में स्वर्गीय परंपरा से कहा गया है: “क्योंकि उसकी महिमा भरपूर है; पृथ्वी उसका ज्ञान गाती है।” यह दिखाता है कि दया-गायन और महिमा का अनुभव कहाँ से शुरू होता है।
- रोम 11:36 बताता है कि सब कुछ उसी के द्वारा, उसी के लिये और उसी में है; pagination, समय-स्थिति से ऊपर उठकर परमेश्वर का एकत्वपूर्ण शासन उजागर होता है।
- फिलिप्पि 2:9–11 में यीशु के नम्रता से exaltation की कथा है जो पूरे ब्रह्मांड में भगवान की महिमा कैसे प्रकट होती है, उसका दिव्य नमूना है।
व्यावहारिक विचार
हमारा जीवन भी उसी महिमा के अनुरूप ढाला जाए: evangelical worship, दिमाग और हृदय में प्रभु के स्पष्ट शासन को मानना; कठिन परिस्थितियों में भी “युगानुयुग” की दृष्टि रखना कि ईश्वर का योजनात्मक राज्य कभी टलता नहीं। दूसरों के साथ सम्मान और करुणा के साथ व्यवहार करें, क्योंकि सभी सृजित वस्तुएं उसकी स्तुति के लिए बनाए गये हैं।
संक्षिप्त निष्कर्ष
गीत-युग की यह घोषणा एक सार्वभौमिक, अंतहीन राज-ख़बर है: सिंहासन पर बैठा वही प्रभु है, जिसकी स्तुति सृष्टि के हर अंश में गूंजती है और जिसका राज्य कभी समाप्त नहीं होता।