Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 14:1 लूका 14:2 लूका 14:3 लूका 14:4 लूका 14:5 लूका 14:6 लूका 14:7 लूका 14:8 लूका 14:9 लूका 14:10 लूका 14:11 लूका 14:12 लूका 14:13 लूका 14:14 लूका 14:15 लूका 14:16 लूका 14:17 लूका 14:18 लूका 14:19 लूका 14:20 लूका 14:21 लूका 14:22 लूका 14:23 लूका 14:24 लूका 14:25 लूका 14:26 लूका 14:27 लूका 14:28 लूका 14:29 लूका 14:30 लूका 14:31 लूका 14:32 लूका 14:33 लूका 14:34 लूका 14:35



लूका 14:35 पर टिप्पणी—भूमि और खाद के लिये न रहने वाला चिह्न
पद में पीठ पूरे संदर्भ में यीशु ने बुलावे की दयालुता को एक चिह्न के रूप में प्रस्तुत किया है। मिसाल के रूप में महाराज दक्षिण-एशिया के अतिथि भोज या मेज़बानी के दृश्य में आम तौर पर निम्न रूप से कहा गया है कि अंकुरित चिह्न वह है जो वातावरण से अति प्रतिक्रियाशील है; जो “एक गंदा, निष्क्रिय फल” बनकर बाहर फेंक दिया जाता है, उसका अंत आश्वस्त है। यहाँ耶穌 एक गहरे धार्मिक चेतावनी दे रहे हैं: परमेश्वर की राज्य में सन्निकटता के लिए बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि वास्तविक परिणाम और जवाबदारी चाहिए।
मुख्य विचार
यह Verse यह दर्शाता है कि शब्दों और धारणाओं की कड़ाई से परखे जाने पर ही आध्यात्मिक आशीष सचमुच फल देती है। यदि मनुष्य विनम्रता, सीखना, और परिवर्तन की इच्छा नहीं रखते, तो उनके लिये परमेश्वर का आह्वान निष्फल हो सकता है। आध्यात्मिक जीवन में परिणाम वही होते हैं जो प्रकृति के नियमों के अनुसार फलते-फूलते हैं—जो अयोग्य मिट्टी में बोया जाए, वह पौधे नहीं बन पाते।
तीन प्रमुख विषय
अनुशासनात्मक पंक्तियाँ (Related Passages)
1) मरकुस 4:20 — शास्त्र की बीज संसार में बहती धारा के अनुसार फल देता है; जो स्पष्ट रूप से सुनता है, वह फल देता है।
2) याकूब 1:22 — केवल भगवान के शब्दों को सुनना नहीं; वे उसे व्यवहार में उतारना भी आवश्यक है।
3) मत्ती 7:21 — न सिर्फ कर्म, बल्कि क्रिया-प्रेम और समर्पण भी आवश्यक है; प्रभु जिसे आप चुद्ध नहीं मानते।
उद्धरण और संदर्भ (सार)
सम्प्रेषित टिप्पणियाँ तीन चर्चित पाणियों से विचार देती हैं: मैथ्यू हेनरी, आल्बर्ट बार्न्स, और एडम क्लार्क ने इसे व्याख्यायित किया है कि बाहरी प्रतिक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण भीतरी परिवर्तन है। इन तीनों के संक्षिप्त बिंदु इस प्रकार हैं:
· मैथ्यू हेन्री: औचित्य और यहूदी धर्म के बाहरी चिह्नों की आलोचना के साथ यह बताने की कोशिश करते हैं कि ईश्वर के कृपापात्र वही हैं जो His will के अनुरूप आचरण बदलते हैं।
· आल्बर्ट बार्न्स: यह वचन आत्म-न्याय और स्व-आलोचना के साथ जुड़कर बताता है कि किस प्रकार आत्म-समर्पण और धारणाओं को छोड़ना चाहिए।
· एडम क्लार्क: यह चेतावनी बताती है कि बाहरी धार्मिकता के बजाय आंतरिक परिवर्तन जरूरी है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
- अपने जीवन की उपलब्धियों और धार्मिक गतिविधियों की समीक्षा करें: क्या आप शब्द सुनते हैं, पर उन्हें लागू नहीं करते?
- ईश्वर के बुलावे को परिणामपूर्वक स्वीकारें: सुनकर एक कदम उठाएँ—यानी नम्रता से आति-स्वार्थ से मुक्त होकर अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएँ।
संवादात्मक संदर्भ (छोटी रेखा)
1) मिसाल 13:23 — सही मिट्टी में बीज पड़ने पर फल मिलता है; अन्यथा नहीं।
2) लूका 8:18 — सुनते समय प्रत्युत्तर के महत्व पर बल देता है।
3) भवन पर और पत्थर पर निर्माण: जो सुनकर व्यवहार नहीं करता, उसे गड़बड़ परिणाम मिलते हैं।
संक्षेप
यह वचन हमें स्मरण कराता है कि परमेश्वर के राज्य में प्रवेश का असली माप व्यवहारिक परिवर्तन है, न कि बाहरी दिखावा। जो सुनते हैं और व्यवहार को बदलते हैं, वे भूमि और खाद की दरकार से मुक्त होकर फलते-फूलते रहते हैं; जो केवल सुनते हैं पर देंन नहीं करते, वे बाहर फेंके जाने के समान हैं।