लूका 14:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इस पर यीशु ने व्यवस्थापकों और फरीसियों से कहा, “क्या सब्त के दिन अच्छा करना उचित है, कि नहीं?”

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लूका 14:3 पद-दर-पद बाइबल टीका

लूका 14:3 का संदर्भ और संदर्भ-संयोजन

यह पद यीशु के भोजन-स्थल पर फरीसियों और व्यवस्थापकों के उपस्थित रहने के बीच के एक उद्देश्यपूर्ण प्रश्न से जुड़ा है। वे लोग परंपरागत सब्त नियमों को कठोर बनाकर दिखाना चाहते थे कि कब और कैसे रोगी या जरूरतमंद की मदद करना उचित है या नहीं। यीशु ने इसी अवसर पर प्रयोग किया ताकि यह स्पष्ट हो कि परमेश्वर का देखना और मानवीय दयालुता के बीच संतुलन क्या होना चाहिए।

मुख्य अर्थ

पद में यीशु से पूछा गया है कि क्या सब्त के दिन अच्छा करना उचित है या नहीं? यीशु ने प्रश्न के उत्तर कोव्याख्यात्मक तरीके से नहीं, बल्कि क्रिया के वास्तविक उदाहरण से प्रस्तुत किया। उनका उद्देश्य यह दर्शाना है कि दिन-प्रतिदिन की जरूरतों में परमेश्वर की दया और कानून के सख्त अर्थ के बीच एक मर्यादित मिसाल होनी चाहिए।

दो–तीन प्रमुख विषय

  • सब्त के दिन भी लोगों की मदद करना परमेश्वर के किताबी अर्थ में शामिल है, क्योंकि भीतरी उद्देश्य दया और पुत्रमोह पर है।
  • व्यवस्था केवल नियम नहीं, बल्कि प्रेम के लक्ष्य की सुरक्षा है; नियम होते हैं ताकि व्यक्ति की सहायता हो सके, न कि उसे रोक कर रोका जाए।
  • वास्तविक जीवन के मामले से यीशु दिखाते हैं कि मानवीय जरूरतों पर कोई नियम प्रबल हो सकता है, अगर उससे अन्य को लाभ पहुँचे।

अन्य प्रासंगिक पाठ

– मत्ती 12:9–14 में यीशु प्रभुत्व आत्म-नियम की धारणाओं को चुनौती देते हैं और बताते हैं कि परमेश्वर के नियम व्यक्ति की सुरक्षा और कल्याण के लिए हैं।

– लूका 6:6–11 में यीशु एक रोगी के साथ सब्त के दिन क्रिया-कार्य करते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कर्म-पर्याप्ति के साथ दया सर्वोच्च है।

– मर्कुस 3:4 में समान विचार प्रकट होते हैं कि सब्त के दिन भी लोगों के जीवन को बचाने और सहायता करने के कार्य अधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

व्यावहारिक चिंतन

हम कैसे देखें कि समय-सीमा या नियम अब भी आपके समुदाय के भीतर दया को रोकते हैं? यह पद प्रेरणा देता है कि हमारी प्राथमिकता दया-क्रिया हो—जैसे किसी पड़ोसी की बीमारी पर ध्यान देना या ज़रूरतमंद के लिए समय देना—बिना न्यायसंगत शंका के। साथ ही यह याद दिलाता है कि किसी भी अच्छे नियम का उद्देश्य जीवन को बढ़ाने का है, न कि उसे घुटनों पर गिराने का।

संक्षिप्त समापन

इस पाठ में यीशु ने दिखाया कि परमेश्वर के उद्देश्य में कानूनी कठोरता से अधिक मूल्य दया और सहायता का है। सब्त का उद्देश्य शारीरिक-आत्मिक राहत है; अतः आवश्यकता पर निर्णय लेते समय प्रेम और करुणा को प्राथमिकता दी जाए।

कथनात्मक नोट्स (संदर्भ-उद्धरण)

नोट: नीचे दी गई उद्धृत पंक्तियाँ प्रसिद्ध सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के सार से प्रेरित हैं—फुटनोट में मौलिक वाक्यांश शामिल हैं, यदि उपलब्ध हों:

मैथ्यू हेन्री से के कुछ समानार्थी विचार इस संदर्भ में उभरते हैं कि नियमों की सार बनाम दया की सार के बीच सही संतुलन परमेश्वर के राज्य का संकेत है।

Cross-references

  • मत्ती 12:9–14 — सब्त के नियम की कसौटी में दया का महत्त्व; आवश्यक सहायता के लिए नियमों की सीमा नहीं। समझ बढ़ती है कि धर्म-नियम समुदाय की भलाई के लिए हैं।
  • लूका 6:6–11 — रोगी के प्रति क्रिया-निष्ठा और सब्त के दिन की क्रिया; दया और नियम एक होकर चलती हैं।
  • मरकुस 3:4 — पथ-प्रदर्शन और उपचार का संतुलन; जीवन के लाभ के लिए नियमों के भीतर दया को प्राथमिकता दी जाती है。

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

लूका 14:3 समानांतर पद और संबंधित वचन

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वहाँ एक मनुष्य था, जिसका हाथ सूखा हुआ था; और उन्होंने उस पर दोष लगाने के लिए उससे पूछा, “क्या सब्त के दिन चंगा करना* उचित है?”

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और उनसे कहा, “क्या सब्त के दिन भला करना उचित है या बुरा करना, प्राण को बचाना या मारना?” पर वे चुप रहे।

लूका 13:14 HINIRV संबंधित बाइबल पद का चित्र
लूका 13:14 (HINIRV) »
इसलिए कि यीशु ने सब्त के दिन उसे अच्छा किया था*, आराधनालय का सरदार रिसियाकर लोगों से कहने लगा, “छः दिन हैं, जिनमें काम करना चाहिए, अतः उन ही दिनों में आकर चंगे हो; परन्तु सब्त के दिन में नहीं।” (निर्ग. 20:9-10, व्य. 5:13-14)

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