मत्ती 12:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

वहाँ एक मनुष्य था, जिसका हाथ सूखा हुआ था; और उन्होंने उस पर दोष लगाने के लिए उससे पूछा, “क्या सब्त के दिन चंगा करना* उचित है?”

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मत्ती 12:10 पद-दर-पद बाइबल टीका

सीधे अर्थ का वर्णन

मत्ती 12:10 में यीशु के समक्ष एक सूखा हाथ वाला व्यक्ति है; फिलिस्तीनी धार्मिक नेताओं ने उसे तौलते हुए देखा कि क्या शब्त के दिन चंगा करना उचित है। आखिर उन्होंने यीशु से जवाब माँगा, ताकि वह उस पर दोष लगा सकें। परन्तु यह घटना इस बात को उजागर करती है कि परमेश्वर के नियम और करुणा के बीच संतुलन कैसे बनता है।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

यह स्थल शब्त के नियम पर बहस का हिस्सा है। यीशु ने पहले चंगा कर दिखाकर अपने साक्ष्य को क्रियात्मक बना दिया था: शब्त के दिन मानवीय जीवन और दया अधिक महत्त्वपूर्ण है—यहाँ यह स्पष्ट है कि धार्मिक कठोरता से compassion पीछे नहीं हटती। मत्ती के Gospel में इस घटना के साथ यीशु के पुराने धार्मिक ताने-बाने पर कटाक्ष और नए अभ्यास की स्थापना दिखती है: परमेश्वर का हृदय, नियम के पीछे नहीं बल्कि जीवित उद्धार के लिए है।

व्याख्यात्मक विचार

  • योजना बनाम करुणा: शब्त के दिन चंगा करना एक ऐसी क्रिया है जो मानव की आवश्यकता को केंद्र बनाती है, न कि नियम की कठोरता को।
  • धर्मशास्त्र की आलोचना: यीशु ने स्पष्ट किया कि नियम मनुष्यों के लिए हैं, न कि मनुष्यों के लिए नियमों के कारण।
  • विश्वास का प्रतीक: सूखा हाथ एक शारीरिक कमजोरी है, जो आस्था के परीक्षण के रूप में भी देखा जा सकता है; यीशु की चंगा करने की क्षमता इस आस्था पर प्रकाश डालती है।

संयुक्त दृष्टिकोण (तीन-पिट्ठी सार)

  1. परमेश्वर की करुणा नियमों से बढ़कर है; जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि है।
  2. विश्वसनीय आस्था वही है जो यीशु के क्रिया-प्रकाश से पुष्ट हो।
  3. कठोरता बनाम दया—धर्म के भीतर प्रेम का सर्वोच्च निर्देश है: दूसरे के लाभ के लिए नियम का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

क्रॉस-रेफरेंस और संकेत

यात्रा में अन्य संदर्भ जो इस विचार से सहमत हैं: “तुम मोजूद नियमों को मानव के लिए नहीं, बल्कि मानव को नियमों के अनुरूप बनाते हो”—यह विचार यीशु के शब्दों में दोहराव पाता है (सूचनात्मक संदर्भ)। साथ ही, कुछ जगहों पर दया के साथ शास्त्र का समन्वय किया गया है जो इस प्रकार हैं: नियम और करुणा के बीच संतुलन की शिक्षा देता है (अन्य ग्रंथों के छोटे संदर्भों की नज़र से)।

व्यावहारिक निष्कर्ष

हमारा जीवन भी ऐसे निर्णयों में फँसता है जहाँ नियम और करुणा के बीच चुनाव करना पड़ता है। कठिन परिस्थितियों में Jesus के उदाहरण से सीख मिलती है कि मानवीय आवश्यकता के समय दया प्राथमिक होनी चाहिए, और नियमों को भी मानवीय संदर्भ में समझना चाहिए ताकि परमेश्वर के हृदय की इच्छा पूरी हो।

महत्वपूर्ण उद्धरण (public-domain से संकेत)

नोट: नीचे केवल सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के संकेत हैं और यदि उपयुक्त मिले, तो संक्षेप में उद्धृत हैं:

Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सामान्य विचारों से गहराई मिलती है कि शब्त के दिन करुणा परमेश्वर के नियम के भीतर ही आती है और मानवता के लिए उद्धार का मार्ग है।

अनुपयुक्त शब्दावली के बिना, इस पंक्ति का सार यह है कि करुणा नियम से ऊपर नहीं है, बल्कि उसी के अनुरूप है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

मत्ती 12:10 समानांतर पद और संबंधित वचन

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इसलिए कि यीशु ने सब्त के दिन उसे अच्छा किया था*, आराधनालय का सरदार रिसियाकर लोगों से कहने लगा, “छः दिन हैं, जिनमें काम करना चाहिए, अतः उन ही दिनों में आकर चंगे हो; परन्तु सब्त के दिन में नहीं।” (निर्ग. 20:9-10, व्य. 5:13-14)

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इस पर कई फरीसी कहने लगे, “यह मनुष्य परमेश्‍वर की ओर से नहीं*, क्योंकि वह सब्त का दिन नहीं मानता।” औरों ने कहा, “पापी मनुष्य कैसे ऐसे चिन्ह दिखा सकता है?” अतः उनमें फूट पड़ी।

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और उसकी घात में लगे रहे, कि उसके मुँह की कोई बात पकड़ें।

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