Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
मत्ती 12:1 मत्ती 12:2 मत्ती 12:3 मत्ती 12:4 मत्ती 12:5 मत्ती 12:6 मत्ती 12:7 मत्ती 12:8 मत्ती 12:9 मत्ती 12:10 मत्ती 12:11 मत्ती 12:12 मत्ती 12:13 मत्ती 12:14 मत्ती 12:15 मत्ती 12:16 मत्ती 12:17 मत्ती 12:18 मत्ती 12:19 मत्ती 12:20 मत्ती 12:21 मत्ती 12:22 मत्ती 12:23 मत्ती 12:24 मत्ती 12:25 मत्ती 12:26 मत्ती 12:27 मत्ती 12:28 मत्ती 12:29 मत्ती 12:30 मत्ती 12:31 मत्ती 12:32 मत्ती 12:33 मत्ती 12:34 मत्ती 12:35 मत्ती 12:36 मत्ती 12:37 मत्ती 12:38 मत्ती 12:39 मत्ती 12:40 मत्ती 12:41 मत्ती 12:42 मत्ती 12:43 मत्ती 12:44 मत्ती 12:45 मत्ती 12:46 मत्ती 12:47 मत्ती 12:48 मत्ती 12:49 मत्ती 12:50


मत्ती 12:37 पर टिप्पणी
पद का संदेहपूर्ण संदर्भ उन उपस्थित सवालों से जुड़ा है जो यीशु के साथ धार्मिक नेताओं के बीच हुए तकरार में उभरते हैं। यहाँ कहा गया है कि व्यक्ति अपनी बातों के कारण निर्दोष नहीं ठहर सकता, बल्कि अपनी बातों के कारण दोषी ठहराया जाएगा। यह विचार यह दिखाता है कि अंतःमन की चेतना और निन्दा-उद्धार की गूंज कैसे एक व्यक्ति के निर्णय और उसके अभिव्यक्त शब्दों से जुड़ती है।
मुख्य अर्थ
इस verses में विशेष ध्यान यह है कि हर व्यक्ति अपने शब्दों के उत्तरदायित्व के साथ जीता है। शब्द माने जाने वाले कर्म हैं—यही कारण है कि बोल-चाल से व्यक्ति अपने आचार-व्यवहार और विश्वास की स्थिति उजागर कर देता है। यदि आचरण पवित्र है, तो शब्द सामान्य से अधिक उजागर होंगे; यदि नहीं, तो शब्द अपने आप एक न्यायपूर्ण जाँच का आधार बन जाते हैं।
की मुख्य थीम
पड़ोसी से जुड़ी क्रॉस-रेफरेंसेज
इन क्रॉस-रेफरेंसेज में दिखता है कि बाहरी प्रकट और आंतरिक स्थिति एक ही धागे से पिरती है—भाषा से नहीं, बल्कि दिल की स्थिति से ही नैतिक मूल्य निर्धारित होते हैं।
व्यावहारिक विचार
व्यावहारिक तौर पर यह verse हमें याद दिलाता है कि—किसी से ईमानदार बातचीत के समय अपने शब्दों पर नियंत्रण रखें, तथा आवश्यकता के अनुसार बोलें। सम्मान, विनम्रता और सत्य की भावना से बोलना, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन दोनों में रक्षा करता है। अपने विचारों को स्पष्ट, पर दयालु बनाकर व्यक्त करना सीखना चाहिए ताकि हमारी बातें हमारे विश्वास के अनुरूप हों।
संक्षिप्त समापन
इस पद का संकेत है कि हमारे शब्द और विचार एक अनुशासनात्मक मानक के अधीन हैं। ईश्वरीय दृष्टि से, अंततः हर व्यक्ति अपनी आत्मा के सत्य और शब्दों के प्रमाण के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा। इस ज्ञान के साथ जीवन बिताने से न सिर्फ हमारी सच्ची पहचान उजागर होती है, बल्कि सचेत वाणी से हम दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनते हैं।
उद्धृत विचारों के लिए नीचे की शाखाओं में संक्षेप उल्लेख देखें:
सम्बन्धित पवित्र ग्रंथ चिह्न: मत्ती 12:37 का उद्देश्य यह है कि वाणी के लिए उत्तरदायित्व के साथ चलें; दिल की सच्चाई ही शब्दों की समीक्षा बनती है।