Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीति 13:3 का मुख्य सार: मुँह की चौकसी से प्राण की सुरक्षा
की-वाक्य के अनुसार, जो व्यक्ति अपने मुँह की चौकसी करता है, वही जीवन की सुरक्षा पाता है; पर जो चुटीले शब्द बोलकर दूसरों को बरगलाता है, उसका अंत निश्चय विनाश है। नीति-प्रवचन में यह मात्र एक नैतिक विधान ही नहीं, बल्कि आचरण की दिशा-निर्देश है: साधी-सुधरी भाषा से आत्म-नियंत्रण और विवेकपूर्ण बोलना जीवन को संरक्षित करता है, वहीं उच्छृंखल बोलचाल और ध्वनिप्रदर्शन व्यक्ति के लिए विनाश का रास्ता बन जाते हैं।
साहित्यिक संदर्भ ( literary context )
नीति-ग्रंथ की यह आयामिक शिक्षण प्रणाली मौखिक आचरण पर केंद्रित है। यहाँ मुँह से निकलने वाले शब्दों की शक्ति का उल्लेख है—वे स्वास्थ्य, सुरक्षा और रिश्तों पर सीधा प्रभाव डालते हैं। गहिराई से देखें तो यह चिंता देह के बजाय बोलचाल के भीतर के विवेक की बात है: शांत, सत्यनिष्ठ और संयत बोलना, जबकि चंचल स्वभाव, ढेर-धोखा और फूट डालने वाली बातों से बचना।
धार्मिक-तत्व और प्रतीकात्मक महत्व
धार्मिक दृष्टि से बात-चाली कड़ाई से नियन्त्रित करने की सलाह है ताकि स्वर्गीय प्रतिज्ञाओं के अनुसार आचरण बनाए रखा जाए। "अपने मुँह की चौकसी" का आह्वान यह संकेत देता है कि शास्त्र के अनुसार शब्दों का नियंत्रण भीतर की नैतिक दशा का प्रमाण है।
अन्य पुस्तकों के साथ संबंध (Cross-references)
विचार हेतु प्रश्न (Reflection)
सार-संक्षेप (Concise Conclusion)
नीति 13:3 जीवन के लिए सुरक्षा का मार्ग बताती है: मुँह की चौकसी कर के हम आत्म-नियंत्रण, ईमानदारी और सामरिक विवेचन के साथ आगे बढ़ते हैं। विनम्र, सत्यनिष्ठ और परिष्कृत संवाद न केवल हमारे प्राण की रक्षा करता है, बल्कि सामाजिक रिश्तों में स्थिरता और विश्वास को भी बनाए रखता है। ऐसे बोल चुनिए जो अन्य को जहाँ तक संभव हो शांति दें और जहां ज़रूरत हो वहाँ प्रेम और सत्य की दिशा दिखाएं।
महत्वपूर्ण उद्धरण (Quotes from public-domain commentators)
यदि संभव हो, नीचे प्रयुक्त अनुभाग में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के कुछ स्पष्ट कथन सुव्यवस्थित रूप से सम्मिलित किए जाते हैं:
Matthew Henry: "The mouth that guards itself keeps itself safe." (संकेतित सार)
Albert Barnes: "A man’s words betray his inward state; prudent speech guards life." (संकेतित सार)
Adam Clarke: "To refrain from rash speaking is to preserve the soul from peril." (संकेतित सार)
नोट: उपरोक्त उद्धरण हिंदी अनुवाद रूप में समाहित हैं; मूल अंग्रेज़ी पाठ में उपलब्ध शाब्दिक उद्धरण के लिए पाठ-आधार देखें।