Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 13:1 नीतिवचन 13:2 नीतिवचन 13:3 नीतिवचन 13:4 नीतिवचन 13:5 नीतिवचन 13:6 नीतिवचन 13:7 नीतिवचन 13:8 नीतिवचन 13:9 नीतिवचन 13:10 नीतिवचन 13:11 नीतिवचन 13:12 नीतिवचन 13:13 नीतिवचन 13:14 नीतिवचन 13:15 नीतिवचन 13:16 नीतिवचन 13:17 नीतिवचन 13:18 नीतिवचन 13:19 नीतिवचन 13:20 नीतिवचन 13:21 नीतिवचन 13:22 नीतिवचन 13:23 नीतिवचन 13:24 नीतिवचन 13:25



नीतिवचन 13:7 का महत्व और संदर्भ
यह वचन धन के साथ बनी आभा के पीछे नहीं भागने का वास्तविक पाठ सीख देता है। कहावत में एक तरफ ऐसा व्यक्ति है जो धन एकत्र तो करता है, पर उसके पास समान्तर रूप से कुछ नहीं बचता; दूसरी तरफ ऐसा व्यक्ति है जो धन उड़ाता है, फिर भी उसके पास बहुत रहता है। इसका उद्देश्य धन के स्रोत और उपयोग दोनों के बारे में सूझ-बूझ को उभारना है—आकंक्षित धन-संपत्ति के प्रति मानव स्वभाव की सूकर-सी अति एवं संतोष की कमी के विरुद्ध सचेत होना।
asli संदर्भ और मूल संदेश
नीतिवचन में यह सच कई बार दो विपरीत प्रवृत्तियों को एक साथ सामने लाता है: धन की प्रभा और मनुष्य की निर्बलता। एक व्यक्ति जो धन जमा करता है, वह अक्सर ऐसा नहीं कर पाता कि उसकी जमा-रेखाओं के बीच संतोष हो; जबकि दूसरा व्यक्ति धन के अपव्यय से भी उतना लाभ नहीं उठाता और फिर भी धन का आभास बहता रहता है। यह केवल वित्तीय आचरण नहीं है, बल्कि एक जीवन-निष्ठा का प्रश्न है—कितना लोग अपनी आशाओं, सुरक्षा और चरित्र को धन के भरोसे पर टाँगते हैं।
मूल विषय का व्यंजना
मुख्य विचार यह है कि धन संसाधन है, उसका मूल्य इस बात पर निर्भर नहीं करता कि कितना एकत्र किया गया है, बल्कि यह कि धन के साथ व्यक्ति का जीवन कैसे संचालित होता है। धन-प्राप्ति और धन-खर्च के बीच संतुलन बनाकर ही व्यक्ति स्थिर और विश्वासयोग्य बनता है। यह प्रेरित करता है कि हम धन के पीछे नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य और ईश्वर-प्रेरित चेन पर टिके रहें।
Cross-reference और उनकी संक्षिप्त समझ
पवित्र ग्रंथों के साथ संरेखण
यह वचन दया और प्रवृत्ति के बीच संतुलन विकसित करने की शिक्षा देता है—धन चाहे जमा हो या उड़ा दिया जाए, दोनों परिस्थितियाँ समय-समय पर आ सकती हैं। संतोष और सदाचार, नीतियाँ, और कर्म-निष्ठा पर जोर बढ़ता है।
2-3 व्यावहारिक क्रॉस-रेफरेंस और उनके अर्थ
1) प्रेरित-जीवन में संतोष का महत्व: धन की परिभाषा के बदले आंतरिक शांति और ईश्वर-आश्वासन को प्राथमिकता दें। यह संदर्भ दर्शाता है कि धन-लाभ के साथ स्थिरता आनी चाहिए, न कि हर समय तंगहाली या घनीच तक।
2) विवेकपूर्ण बचत और दान-त्याग: खर्च-समय को योजना से व्यवस्थित करें; आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के पीछे भागना मानसिक संतोष को घटाता है।
3) आशीष और उद्देश्य: धन केवल साधन है; इसे परमेश्वर के उद्देश्यों के अनुरूप प्रयोग करें ताकि जीवन में ईश्वर की स्थिरता बनी रहे।
एक संक्षिप्त devotional विचार
कभी-कभी हम धन के पीछे दौड़ते हैं ताकि अस्थिरता को स्थिरता लग सके; पर वही दौड़ हमें असंतोष दे देती है। सही मार्ग वही है जिसमें हम धन को ईश्वर की दया से मान-समझकर उपयोग करें, और उनके आगे अपनी प्राथमिकताओं को समर्पण करें। संतोष और उदारता दोनों साथ चलते हैं—यही वास्तविक जीवन की समझ है।
संदर्भ-चयन
नीतिवचन 11:28; फिलिप्पियों 4:11-13; मत्ती 6:19-21—ये तीनों देखने को देते हैं कि धन के साथ जीवन कैसे संतुलित किया जाए और किस प्रकार ईश्वर की वस्तु-अनुरागी दृष्टि धन-प्राप्ति को दिशा देती है।
संक्षेपित निष्कर्ष
नीतिवचन 13:7 धन के बारे में सतर्क और परमेश्वर-केन्द्रित जीवन का संदेश देता है: धन जमा करें या उड़ाएं, परन्तु उनके पीछे जीवन की साधना-धारा को न खोएँ। संतोष, विवेक और उदारता—ये तीनों मिलकर एक स्थिर और ईमानदार जीवन बनाते हैं।