Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 23:1 नीतिवचन 23:2 नीतिवचन 23:3 नीतिवचन 23:4 नीतिवचन 23:5 नीतिवचन 23:6 नीतिवचन 23:7 नीतिवचन 23:8 नीतिवचन 23:9 नीतिवचन 23:10 नीतिवचन 23:11 नीतिवचन 23:12 नीतिवचन 23:13 नीतिवचन 23:14 नीतिवचन 23:15 नीतिवचन 23:16 नीतिवचन 23:17 नीतिवचन 23:18 नीतिवचन 23:19 नीतिवचन 23:20 नीतिवचन 23:21 नीतिवचन 23:22 नीतिवचन 23:23 नीतिवचन 23:24 नीतिवचन 23:25 नीतिवचन 23:26 नीतिवचन 23:27 नीतिवचन 23:28 नीतिवचन 23:29 नीतिवचन 23:30 नीतिवचन 23:31 नीतिवचन 23:32 नीतिवचन 23:33 नीतिवचन 23:34 नीतिवचन 23:35


नीतिवचन 23:1—जब तू किसी हाकिम के संग भोजन करने को बैठे, तब इस बात को मन लगाकर सोचना कि मेरे सामने कौन है?
यह एक छोटी सी, पर गहराई से प्रभावित करने वाली चेतावनी है कि व्यक्ति खान–पान के क्षण को ऐसे अवसर की तरह देखे जिसमें उसकी नीति और चरित्र परीक्षण के सम्मुख आते हैं। राजा या अधिकारी के साथ भोजन करना सामान्य-सी सामाजिक व्यवस्था हो सकता है, पर सच्ची श्रद्धा और विवेक यहां परखा जाता है: भोजन केवल पेट भरने की क्रिया नहीं, फलस्वरूप सामाजिक आचरण का प्रदर्शन है। धर्मग्रंथ में भोजन के साथ नैतिक जागरूकता का संयोजन बार-बार दिखता है—क्योंकि भोजन का अवसर हमारी अन्तःस्थापना, ईमानदारी और निर्णय-शक्ति को प्रतिबिंबित करता है।
संधर्भित पृष्ठभूमि और मूल संदर्भ
नीतिवचन के इस वाक्य में लेखक एक विशिष्ट सामाजिक स्थिति की ओर संकेत करता है: किसी उच्च अधिकारी के साथ भोजन-संध्या का अवसर। कुरसी पर बैठना, मेज के सामने आना और ऊँचे पद पर बैठे व्यक्ति के सामने अपने आचरण को नियंत्रित करना—यह सब एक नैतिक आचार-चक्र के केंद्र में है। यह केवल छवि-उद्धरण नहीं, बल्कि स्पष्ट आग्रह है कि प्रभुत्व-संवाद, विनम्रता और ईमानदारी सभी समयों में बनाए रखें।
मुख्य संदेश
मुख्य बात यह है कि जब हम प्रतिष्ठित व्यक्ति के सम्मुख भोजन कर रहे हों, तो हमें अपने दिमाग को सचेत, सतर्क और भक्तिपूर्ण बनाए रखना चाहिए। यह चेतावनी दो चीजों पर केंद्रित है: (1) भीतर की विनम्रता—अपने स्वार्थ, शोकेस या चाटुकारिता से बचना; (2) बाहर की चतुराई—कथित आदर्श दिखाने के चक्कर में वास्तविक आचरण से दूर न हटना। भोजन का अवसर सामाजिक दबदबे की परीक्षा है: क्या मैं सच में ईमानदार और नम्र हूँ, चाहे मुझे लाभ मिल रहा हो या नहीं?
कठोर और सहयोगी थीम्स
स्पष्ट cross-references
1) यशायाह 1:11-17 — दुराचारपूर्ण कर्मों के सामने धार्मिक आचरण की शुद्धता अपेक्षित है; बाहरी रीतियों के बजाय न्याय और करूणा आवश्यक है।
2) कुलुस्सियों 3:8-9 — पुराने आदमी को उतारकर 새 आदमी को धारण करना; परम-स्वार्थता से मुक्त होकर प्रेम-आचरण अपनाना।
3) मत्ती 6:1-4 — दान-देना और उपहार दिखावे से अधिक ईमानदारी और गुप्त रूप से किये गये आचरण की प्रशंसा।
पवित्र पाठ के साथ संकल्प
इस वाक्य के संदर्भ में हमारी प्रार्थना यह हो कि हम हर अवसर को ईश्वर के सम्मुख एक अकाउंट-विहीन परीक्षण की तरह लें। भोजन के क्षण केवल आराम के नहीं, अपितु आत्म-निरीक्षण और दूसरों के प्रति सम्मान की मिसाल बनते हैं। जीवन के हर मोड़ पर हम अपने मन, हमारी बात और our आचार-व्यवहार को ऐसे बनाए रखें कि लोग देखें: यह व्यक्ति सत्यनिष्ठा और नम्रता से भरा है।
संक्षिप्त उद्धरण संदर्भ (पद-आह्वान के लिए)
आइक्युक्त उद्धरण: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार-उद्धरण आवश्यकतानुसार मूल पाठ से समझने के लिए संकलित हैं।
याद रहे: इन विचारों का उद्देश्य तर्क-संगत समाज-व्यवहार को प्रेरित करना है, न कि किसी विशिष्ट मत-धरातल को बढ़ावा देना।