Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
नीतिवचन 23:1 नीतिवचन 23:2 नीतिवचन 23:3 नीतिवचन 23:4 नीतिवचन 23:5 नीतिवचन 23:6 नीतिवचन 23:7 नीतिवचन 23:8 नीतिवचन 23:9 नीतिवचन 23:10 नीतिवचन 23:11 नीतिवचन 23:12 नीतिवचन 23:13 नीतिवचन 23:14 नीतिवचन 23:15 नीतिवचन 23:16 नीतिवचन 23:17 नीतिवचन 23:18 नीतिवचन 23:19 नीतिवचन 23:20 नीतिवचन 23:21 नीतिवचन 23:22 नीतिवचन 23:23 नीतिवचन 23:24 नीतिवचन 23:25 नीतिवचन 23:26 नीतिवचन 23:27 नीतिवचन 23:28 नीतिवचन 23:29 नीतिवचन 23:30 नीतिवचन 23:31 नीतिवचन 23:32 नीतिवचन 23:33 नीतिवचन 23:34 नीतिवचन 23:35



नीतिवचन 23:26 पर केंद्रित व्याख्या
मुख्य interpretive बिंदु: पिता-पुत्री संबंध की गर्मजोशी के साथ एक विनयपूर्ण आह्वान है कि जीवन के मार्ग के लिए पुत्र अपने मन और उसकी दृष्टि—यानी नियत कार्यों और व्यवहार—को कर्तव्यपरक लक्ष्य की ओर केंद्रित करे। यहाँ माता-पिता के प्रेम और शिक्षा के साथ दिमागी-आचार का संगम दिखता है: मन को सही दिशा में रखना ताकि चाल-चलन पवित्र और जीवन के नैतिक मानदंडों के अनुरूप हो।
पाठ-संदर्भ का साहित्यिक संदर्भ
नीतिवचन का यह वचन नए आचरण की प्रेरणा देता है: पुत्र-मन को माँगता है कि वह अपने जीवन के केंद्र में नैतिकता और विवेक रखे। यह पाठ परिवार के भीतर शिक्षा-प्रशासन, अनुशासन और व्यवहार-उचितता के महत्व को रेखांकित करता है। ऋषियों की शिक्षाओं में यह बात बारंबार मिलती है कि शब्द से अधिक सूक्ष्म है मन की दिशा और दृष्टि की पकड़।
धर्मशास्त्रीय महत्व
यहां मन और चाल-चलन के बीच का गहरा संबंध स्पष्ट है। मन के अनुसार ही जीवन-व्यवहार बनते हैं; इसलिए पुत्र से अपेक्षा है कि उसका मन सत्य, पवित्रता और कर्तव्यपरायणता की ओर लगे रहे। यह वचन बच्चों के आचरण के लिए एक आंतरिक प्रेरणा देता है—शिक्षा बाहरी नियमों से अधिक प्रभावशाली तब होती है जब मन की प्राथकिता सही हो।
किर्तिमय शाखा: अन्य शास्त्रीय दृष्टिकोण
धार्मिक पंरपरा में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के तात्पर्य से नीचे दिए गए बिंदु एकीकृत होते हैं:
इन Commentary traditions के संकेतों से यह सिद्धांत उभरता है कि दिल का रुझान ईमानदारी और न्याय के मार्ग पर हो, ताकि व्यवहार विश्वसनीय और सामाजिक रूप से सम्मानजनक बने।
पवित्र लेखन के साथ संयोग: cross-references
सोचने के प्रश्न (Reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
हे मेरे पुत्र, अपना मन मेरी ओर लगा—यही मूल निर्देशन है ताकि तुम्हारे चालचलन सत्य, न्याय और विनय के साथ मिलें। मन की दिशा कैसी है, यह जीवन-आचरण की दिशा तय करती है। परमेश्वर की राह में मन को स्थिर रखना ही व्यवहार की स्थायित्व और नैतिकता का आधार है।