नीतिवचन 23:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

जो डाह से देखता है, उसकी रोटी न खाना, और न उसकी स्वादिष्ट भोजनवस्तुओं की लालसा करना;

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नीतिवचन 23:6 पद-दर-पद बाइबल टीका

नीतिवचन 23:6 का संदर्भ और अर्थ

यह आयत किसी अवसर पर खाने-पीने की दावतों या स्वादिष्ट भोजन की लालच से दूर रहने की चेतावनी देती है, ताकि डाह prejudice या प्रेरित स्वार्थ से बचा जा सके। संदर्भ यह दिखाता है कि प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ मीठे व्यवहार दिखाने पर भी मनपसंद भोजन की नक़री और दाम देने की सोच अपने भीतर ज्वाला बन सकती है। अंततः यह शुद्ध सत्कार, श्रीमान-परक और विशुद्ध अंतःकरण की मांग है—जहाँ भोजन और आराम गम्भीर नैतिक चयन बन कर सामने आते हैं।

मुख्य अर्थ

इस आयत में हिदायत है कि ऐसी जगहों और व्यक्तियों के साथ भोजन- Pleasure के अवसर से दूर रहें, जहाँ डाह या ईर्ष्या की भावना पनपती हो। लालच में आकर किसी की रोटी या स्वादिष्ट भोजनवस्तुओं की मोह में फंसना न केवल व्यावहारिक नुकसान देता है, बल्कि मानसिक शान्ति और नैतिक विवेक को भी खो देता है। बौद्धिक संतुलन बनाए रखना और ईश्वर के प्रति विश्वस्त आचरण बनाए रखना अधिक महत्व रखता है।

2-3 प्रमुख विषय

  • ईर्ष्या और स्वाद की परीक्षा: डाह मन में उठने पर चोरी-चुपके से मन को आहत कर सकती है और निर्णय-शक्ति को घटाती है।
  • संयम की महत्ता: भोजन-आनंद के बीच भी आत्म-नियंत्रण और नैतिक सतर्कता आवश्यक है।
  • वास्तविक आशीर्वाद की पहचान: सच्चा आन्नद वह है जो ईश्वर के साथ शान्ति और संतुष्टि में आता है, न कि दूसरों के वितरण और शो-पीस में।

उद्धृत संदर्भों से समेकित दृष्टि

यह विचार कई पुराने टिप्पणीकारों के अनुसार “दिमाग के भीतर की ग़लत प्रेरणाओं” पर केंद्रित है। उदाहरण के लिए, मैठ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क ने संकेत दिया है कि बाहरी साधनों के पीछे छिपी लालच और ईर्ष्या अंतःकरण को दूषित कर सकती है। उनके सार विचार: आत्मा की शुद्धि और ईश्वर-विश्वासपूर्ण विवेक ही वास्तविक आशीर्वाद का मार्ग है। (संदेश-सार में उद्धृत छोटे विचार)

संपर्कित प्रतिपादन

1) प्रकरणों से जुड़े विचार—नीतिवचन 24:1-2 देखें जहां पथ-प्रवृत्ति और स्वार्थी मोह के प्रति सावधानी बताई गई है।

2) नीतिवचन 23:17-18—मन की शांति और ईश्वर-भय के अनुरूप रहने की प्रेरणा।

3) मत्ती 6:19-21—धन-संपत्ति में चिपके रहने से अस्थिरता और आंतरिक शान्ति की कमी का संदेश।

व्यावहारिक चिंतन

किसी मेज़ पर शामिल होने से पहले पूछिए: क्या यह स्वाद और आकर्षण मेरी आत्मा की शांति के विरुद्ध तो नहीं है? क्या मैं ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रहा/रही हूँ? ऐसे समय में आत्म-नियंत्रण और दयालु विवेक सबसे बड़ी कसौटी है।

संक्षिप्त निष्कर्ष

नीतिवचन 23:6 हमें स्मरण कराता है कि खाने-पीने की लालच और डाह से दूरी बनाकर ही हम ईश्वर के साथ सच्चे संबंध बना सकते हैं। वास्तविक आशीर्वाद वह है जो आत्मा की शान्ति और सत्य के अनुरूप जीवन से मिलता है—भोजन या शो-ऑफ से नहीं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

नीतिवचन 23:6 समानांतर पद और संबंधित वचन

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उसकी स्वादिष्ट भोजनवस्तुओं की लालसा न करना, क्योंकि वह धोखे का भोजन है।

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