Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 23:23 का मुख्य अर्थ
“सच्चाई को मोल लेना, बेचना नहीं; और बुद्धि और शिक्षा और समझ को भी मोल लेना।” इस वाक्य का केंद्र विचार यह है कि जीवन के वास्तविक मूल्य नीक़ी और ज्ञान-प्रज्ञा में हैं, न कि धन-सम्पत्ति या साख में। परमेश्वर के साथ सच्चे संबंध और सही मनोभाव बुद्धि के मूल स्रोत होते हैं; अतः इन्हें कीमत से आंका जाना चाहिए, न कि संसाधनों से।
साहित्यिक संदर्भ (लिटरेरी कॉन्टेक्स्ट)
नीतिवचन एकाधिक बार मानवीय निर्णयों को व्यवहारिक नियमों के साथ जोड़ता है। यहाँ माँग है कि सत्य, बुद्धि और समझ—ये तीनों आचरण और ज्ञान के मोल हों; भ्रष्ट-धन नहीं। नीतिवचन के अन्य भागों में भी शिक्षा, विवेक, और धार्मिक आस्था का संतुलन दिखता है: संसारिक लाभ अक्सर आड़ में होते हैं, पर वास्तविक मूल्य वही है जो आत्मा के लिए लाभकारी हो।
धर्मशास्त्रीय महत्व
यह पद नैतिक दृष्टि से परमेश्वर-भक्ति और बौद्धिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करता है। सत्य का मूल्य न सिर्फ बाहरी सच से है, बल्कि आंतरिक चरित्र-निर्माण से है। बुद्धि, शिक्षा और समझ को “मोल लेने” से मोड़ना तौहीन या अज्ञान से बचना है; यह वाक्यवारता विश्वास के प्रति एक बुलाहट है कि ज्ञान को ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग के रूप में देखा जाए।
क्रॉस-वर्जन (Cross-References) और उनके संक्षिप्त संबंध
ये संदर्भ संकेत देते हैं कि सत्य, बुद्धि और समझ का मोल मापना न सिर्फ व्यवहारिक सत्य है, बल्कि आध्यात्मिक निर्भरता का भी हिस्सा है।
विचार-प्रश्न (Questions for Reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
नीतिवचन 23:23 सिखाता है कि जीवन के वास्तविक मूल्य धनी संपत्तियों में नहीं, बल्कि सत्यस्वरूप ज्ञान—बुद्धि और समझ—में है। यह शास्त्र हमें विनम्रता के साथ सच को अपनाने, शिक्षा को ईश्वर-केंद्रित दृष्टिकोण से देखने और अपनी संस्कृति-धारणा में नैतिकता को दृढ़ रखने की प्रेरणा देता है।
ध्यान दें (Note on quotations)
इस लेख में Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सीधे पूर्ण उद्धरण नहीं दिये गए हैं; केवल उनके दृष्टिकोण के अनुरूप सार-संयोजन किया गया है। आवश्यक स्थानों पर उनके विचारों के स्वर को संक्षेप में समाहित किया गया है, और कोई पूर्ण वाक्यांश बिना उद्धरण के नहीं लिया गया है।
यह टिप्पणी HINIRV अनुवाद के अनुरूप सरल, स्पष्ट और पाठक-मैत्रीपूर्ण शैली में प्रस्तुत है ताकि हिंदी पाठक उसे सहज ढंग से समझ सकें।